किसी भी समाज में जब सच्चाई लिखी जाती हैं, तो कुछ लोगों के सीने पर मानों साँप रेंगने लग जाते हैं, कुछ फर्जी फ़ीडकलें व्यक्तिगत टिपन्नियाँ करते हैं, तो कुछ विभिन्न नामों से फर्जी सिम कार्ड खरीद कर समाज वालों को धमकियाँ देंते हैं, कुछ लोग ओछी हरकतें करते हैं, कुछ कहते हैं आप भी समाज के अध्यक्ष क्यूँ नही बन जाते …!
अब इन मूर्खों को यह कौन समझाएँ कि यह जो अपने नाम के साथ पट्टा लगा कर अपने आपको बड़ी तोप समझ रहे हैं, यह समाज से चयनित कोई पद नही हैं, बल्कि स्वयँ के पैसों से
खरीदें हुए पद पर बैठ कर अपनी पीठ थपथपा रहे हैं …!
किसी शहर में आठ-दस लोगों की भीड़ इकट्ठा कर ली, तीन चार हजार में किसी भी नाम से सामाजिक संस्था पंजीकृत करवा कर अध्यक्ष, मंत्री या पदाधिकरी बन जाना, कोई तीर मारना नही है, बल्कि इसे चंदा उगाही के लिए समाज की आँखों में धूल झोंकने का काम कहा जा सकता हैं, ऐसे पदाधिकारी बनना ही समाज सेवा हैं, तो फिर प्रत्येक समाज में कोई भी व्यक्ति अपने परिवार का मुखिया हैं, जो अपनेआप को अध्यक्ष घोषित कर सकता हैं, जिस समाज में अपने पैसों से या येन-केन प्रकरेण सात/आठ सौ सदस्य बनाने वाले नेताजी को स्वयँ द्वारा लगाई गई बसों में भर कर खाने-पीने रहने की व्यवस्था की जाने पर यदि उनके पक्ष में हजार ग्यारसों समाज बँधु मतदान करते है और उसी चुनाव में चालीस पैंतालिस सदस्य बनाने वाले नेताजी के पक्ष में लगभग पाँच/छ: सौ समाज बँधु मतदान करते हैं, तो नैतिकता के आधार पर विजेता किसे माना जाना चाहिए …?
संख्याबल पर भले ही अधिक मत प्राप्त करने वाले नेताजी विजयी घोषित हुए हो, मगर नैतिकता के आधार पर यदि विश्लेषण किया जाये तो पैंतालिस सदस्य बना कर समाज बँधुओं से पाँच/छ: सौ मत प्राप्त करने वाले को विजयी माना जाना चाहिए, क्यूँकि लगभग चार/पाँच सौ से ज्यादा समाज बँधुओं का जनसमर्थन पैंतालिस सदस्य बनने वाले के साथ हैं, जबकि आठ सौ सदस्य बनाने वाले नेताजी के पक्ष में लगभग दो सौ समाज बँधुओं ने ही समर्थन दिया है …!
ऐसे समाज में चुनाव में जनसमर्थन नही मिलने के कारण धनबल से सत्ता हासिल करने वाले नेताजी के लिए चुनाव के पश्चात फर्जी पदों की फौज खड़ी करने के लिए मजबूर होना पड़ता हैं, और तब समाज के कुछ छटे हुए सलाहकारों द्वारा सम्पूर्ण भारत वर्ष से समाज के स्थानीय संगठनों के विरोधियों की एक टीम तैयार कर समाज में फूट के बीज बोये जाते हैं, जिसके दुष्परिणाम का दंश उस समाज को झेलना पड़ता हैं …!





