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सामाजिक संस्थाओं में भ्रष्टाचार एक समस्या…,

वर्तमान समय में भ्रष्टाचार केवल एक समस्या नहीं, बल्कि एक व्यवस्था बन चुका है, यह कहना गलत नहीं होगा कि आज यह अपने चरम पर दिखाई देता है, बेईमानी और भ्रष्टाचार दोनों एक दूसरे के पूरक है, यानी दोनों ही साथी है और बेईमानी आदिकाल से चली आ रही है, ऐसा कोई युग नहीं है जिसमें बड़ी-बड़ी बेईमानी नहीं की हो, केवल भ्रष्टाचार को दोष देने से बात पूरी नहीं होती, इसके पीछे जो कारण हैं, उन्हें समझना और स्वीकार करना ज्यादा जरूरी है, पहले भी बेईमानी बड़े और राजा लोगों किया करते थे, अभी भी बेईमानी की झड़े बड़े व्यक्तियों के पास ही है…!

वर्तमान समय में भ्रष्टाचार केवल एक समस्या नहीं, बल्कि एक व्यवस्था बन चुका है, यह कहना गलत नहीं होगा कि आज यह अपने चरम पर दिखाई देता है, बेईमानी और भ्रष्टाचार दोनों एक दूसरे के पूरक है, यानी दोनों ही साथी है और बेईमानी आदिकाल से चली आ रही है, ऐसा कोई युग नहीं है जिसमें बड़ी-बड़ी बेईमानी नहीं की हो, केवल भ्रष्टाचार को दोष देने से बात पूरी नहीं होती, इसके पीछे जो कारण हैं, उन्हें समझना और स्वीकार करना ज्यादा जरूरी है, पहले भी बेईमानी बड़े और राजा लोगों किया करते थे, अभी भी बेईमानी की झड़े बड़े व्यक्तियों के पास ही है…!

सबसे बड़ा कारण है हमारी सामाजिक संस्थाओं में नीतियों का निर्माण अपनी सुविधाओं के अनुसार करना और सँविधान में त्रुटियाँ रख कर समाज को गुमराह करना, भृमित समाज को फर्जी पदों की लालसा देकर जितना आसानी से विभाजित किया जाये, भ्रष्टाचार करने में उतना ही सरल हो जाएगा…!

दूसरी और एक विचित्र स्थिति यह भी देखने को मिलती है, जो काम बिना किसी साधारण सभा में निर्णय लिये बिना किया जाता हैं, वहीं सबसे ज्यादा अनियमितताएं पाई जाती हैं,
जँहा नियम स्पष्ट होते हैं, वँहा निर्णय तुरंत होते हैं और दंड निश्चित होता है,
इसके विपरीत जँहा नियमों को एक सोची समझी साजिश के तहत संसोधित किये जाते है, जिसमें किसी की भी जवाबदेही कमजोर है, वहां भ्रष्टाचार पनपता है, जब व्यक्ति को यह भरोसा हो जाता है कि गलती करने पर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब वह बिना डर के बेईमानी करता है…!

समस्या का समाधान केवल कानून को सख्त करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को सरल और पारदर्शी बनाने में है, जितनी कम कागजी प्रक्रिया होगी, जितनी अधिक डिजिटल पारदर्शिता होगी, और जितनी तेज जवाबदेही तय होगी, भ्रष्टाचार अपने आप कम होता जाएगा…!

नीति-निर्माताओं को इस विरोधाभास को समझना होगा कि जँहा नियंत्रण व्यक्ति विशेष के पास होती है, जँहा अन्य पदाधिकारियों को मुँह खोलने का अधिकार नही होता हैं, जँहा पद केवल नाम के साथ झूठी शान बढ़ाने के काम आते हैं, वहां भ्रष्टाचार अधिक होता है, और जहां नियंत्रण कार्यकारिणी या मंत्री परिषद के पास नही होता है, वहां व्यवस्था सुचारू रूप से कैसे चल सकती है, जब तक इस मूल कारण पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक इस समस्या का समाधान नहीं कर पाएंगे…!

अंत में बात सीधी है, व्यवस्था जितनी सरल, स्पष्ट और जवाबदेह होगी, ईमानदारी उतनी ही मजबूत होगी, और जँहा उलझन, संस्था के नाम में हेरफेर कर धन उगाही की जायेगी, जिसकी जानकारी मंत्रिमंडल को नही होगी, सहयोग राशी कोषाध्यक्ष के हस्ताक्षर युक्त पावती के बिना वसूल की जायेगी, बैक खाते पंजीकृत संगठन के नाम।पर नही होंगे, थोक के भाव में रशीद बुकें छपेगी, धन किसी और प्रायोजन को पूरा करने के उद्धेश्य से जमा किया जायेगा, उस सहयोग रूपी प्राप्त धन की रशीदें किसी अन्य कार्य के लिए प्राप्त रूप में काटी जायेगी, हिसाब दिखाने में देरी और अस्पष्टता होगी, वहां भ्रष्टाचार अपने आप जन्म लेगा…!

👉 सुरेश कुमार व्यास “जानम” ✍️
👉 सिखवाल समाचार ®️
सत्य का दर्पण 🪞 समाज को अर्पण 👏

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