एक सज्जन ने “मंगल भवन अमंगल हारी” का अर्थ पूछा है और यह भी पूछा है कि यह दो बार रामचरितमानस में क्यों आया है…?
तो दोनों बार के दो विशेष अर्थ है, कृपया ध्यान दे ।
पहली बार “मंगल भवन” कहने के पूर्व की चौपाई में इसका सूत्र दे दिया है बाबा तुलसीदास जी ने…,
बाबा कहते हैं:
एँह मह रघुपति नाम उदारा । अति पावन पुरान श्रुति सारा ॥
तो क्यों यह मंगल भवन है…?
क्योंकि इसमें राम का उदार नाम है और यही बात श्रुति (वेद) और पुराण भी उद्घोषित कर रहे हैं…!
मंगल भवन अर्थात् योग का भवन,
मंगल भवन अर्थात् प्राणायाम का भवन,
मंगल भवन अर्थात् ध्यान धारणा समाधि का भवन,
मंगल भवन अर्थात् भक्ति का भवन,
मंगल भवन अर्थात् वेदांत का भवन,
मंगल भवन अर्थात् उपासना का भवन,
मंगल भवन अर्थात् मंत्र तंत्र यंत्र का भवन,
कहते हैं केवल राम नाम के उच्चारण से ही प्राणायाम पूरा हो सकता है और किया जाता है और सिद्ध संत आज भी कर रहे हैं ।
दूसरी बार मंगल भवन तब कहा गया जब पार्वती ने भगवान शंकर को रामकथा सुनाने के लिए कहा,
और महादेव कह उठते हैं कि रामकथा ही सब प्रकार का मंगल भवन है । क्योंकि इसके पूर्व की कथा में सती का मन न लगा, अमंगल हो गया तो महादेव यह सुनिश्चित कर रहे थे कि हे भवानी, यह राम कथा ही सब प्रकार का मंगल भवन है ।
जय जय श्रीराम🙏🌷🙏
साभार: राजशेखर तिवारी फेसबुक






