ब्राह्मणों से निवेदन रचना-2
(गुटखा, सुपारी या पान खा कर मंत्र जप न करें)
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मन्त्रानुच्चारणकाले मुखपूरितास्ये
ताम्बूलगुट्खरसपिच्छिलवक्त्रभाजाम् ।
येषां द्विजत्वमपि लज्जितमद्य लोके
तान् पश्यतां खलु जनाः कथमाचार्यसंज्ञा ॥१॥
भावार्थ (हिन्दी):
जो लोग मंत्रोच्चार करते समय मुँह में सुपारी, गुटखा, पान भरे रहते हैं और जिनके मुख से रस टपकता रहता है, उन्हें देखकर स्वयं ब्राह्मणत्व भी लज्जित होता है, ऐसे लोगों को आचार्य कहना वास्तव में आश्चर्य और विडम्बना है…!
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यज्ञे विधौ जपविधौ च पुरोहितानां
शास्त्रार्थबोधविहितं शुचिवक्त्रभावम् ।
त्यक्त्वा हि गुट्खरसपानरसं दुराचरं
मन्त्रान् पठन्ति विडम्बनमेतदद्य ॥२॥
भावार्थ:
यज्ञ, जप और अनुष्ठान में पुरोहितों के लिए शुद्ध मुख और संयम आवश्यक बताया गया है, किन्तु आज कुछ लोग गुटखा चबाते हुए मंत्र पढ़ते हैं, जो धर्म की खुली विडम्बना है…!
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वेदोच्चरप्रणयिनो ऋषयो पुराणे
शुद्धास्यवक्त्रनियमेन कृतप्रयत्नाः ।
अद्याधुना तु कतिपयाः कलिकालविप्राः
गुट्खारसेन सह मन्त्रजपं कुर्वन्ति ॥३॥
भावार्थ:
प्राचीन ऋषि वेदपाठ करते समय मुख की पवित्रता का विशेष ध्यान रखते थे, किन्तु आज कलियुग में कुछ तथाकथित ब्राह्मण गुटखा खाते हुए ही मंत्र जपते दिखाई देते हैं…!
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होमप्रदीपसमये हविरादिदाने
वक्त्राद् गलत्यधरसिक्तिरसं विचित्रम् ।
दृष्ट्वा हसन्ति खलु देवगणा दिविष्ठाः
किं नाम कर्म भवतीति विडम्बनायाम् ॥४॥
भावार्थ:
हवन और पूजा के समय जब किसी के मुख से गुटखे का रस टपकता है, तो यह दृश्य अत्यन्त विचित्र लगता है, मानो देवता भी इसे देखकर हँसते हों कि यह कैसी पूजा हो रही है…!
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शास्त्रेषु यत्र कथितं शुचिता प्रधानं
मन्त्रेषु यत्र विनयो गुरवोऽपि वन्द्याः ।
तत्राधुना कतिपये कथयन्ति मन्त्रम्
गुट्खाभिभूतवदना विडम्बयन्तः ॥५॥
भावार्थ:
जहाँ शास्त्रों में पवित्रता और विनम्रता को पूजा का आधार बताया गया है, वहीं आज कुछ लोग गुटखा भरे मुख से मंत्र बोलकर धर्म का उपहास कर रहे हैं…!
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धर्मस्य रक्षणविधौ यदि विप्रवर्गः
स्वार्थे निमग्नमनसो विगतश्रुतीनः ।
लोकः कथं नु लभते शुचिमार्गबुद्धिं
दृष्ट्वैव तादृशमिदं विडम्बनाख्यम् ॥६॥
भावार्थ:
यदि धर्म की रक्षा करने वाले ही लोग स्वार्थ और असावधानी में पड़ जाएँ, तो समाज को शुद्ध आचरण का मार्ग कैसे मिलेगा…?
ऐसे व्यवहार से धर्म का मजाक बन जाता है…!
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यत्राधिकारविधिना पुरोहितानां
शुद्धाचरः शुचिवचाः प्रणतिप्रधानाः ।
तत्रैव गुट्खरसभुक्तिमुखाः कियन्तः
मन्त्रान् पठन्ति हसितं जनतां जनयन्तः ॥७॥
भावार्थ:
जहाँ पुरोहितों के लिए शुद्ध आचरण और पवित्र वाणी आवश्यक है, वहीं कुछ लोग गुटखा खाते हुए मंत्र पढ़ते हैं, और जनता के बीच हास्य का कारण बन जाते हैं…!
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देवालयेषु च तथा यजनप्रसङ्गे
गुट्खादिगन्धवहितं मुखमेव दृष्ट्वा ।
भक्ताः स्वयं विहसितं कुरुतेऽत्र लोको
धर्मोऽयमित्यपि कथं नु प्रतिष्ठितः स्यात् ॥८॥
भावार्थ:
मंदिरों और पूजा-अनुष्ठानों में जब पुरोहित के मुख से गुटखे की गंध आती है, तो भक्तों के मन में भी श्रद्धा कम हो जाती है, ऐसे में धर्म की प्रतिष्ठा कैसे बनी रह सकती है…?
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शास्त्रार्थमुग्रवचनैः ऋषिभिः पुराणैः
शुद्धोच्चरः शुचिपदं विधिना प्रतिष्ठम् ।
त्यक्त्वा तदद्य कतिपे कलिकालविप्राः
गुट्खास्वदेन सह मन्त्रजपं विदध्वे ॥९॥
भावार्थ:
ऋषियों ने शास्त्रों में शुद्ध उच्चारण और पवित्रता को अनिवार्य बताया है, किन्तु आज कुछ लोग इन नियमों को छोड़कर गुटखा खाते हुए मंत्र जप रहे हैं…!
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एवं दुराचरमिदं यदि निन्दनीयम्
धर्मस्य हास्यजनकं जनमानसेषु ।
त्याज्यं द्विजैः सकलथैव सुधीजनानां
शुद्धो हि मन्त्रमर्यादा सनातनीया ॥१०॥
भावार्थ:
यह आचरण निन्दनीय है और सम्पूर्ण सनातन समाज में ब्राह्मण समाज तथा धर्म को हास्य का विषय बना देता है, इसलिए ब्राह्मणों को इसे त्यागकर सनातन धर्म की शुद्ध मंत्र-मर्यादा का पालन करना चाहिए…!
साभार: कैलाश शर्मा (अंतराष्ट्रीय पंडित) दौलतगढ़ (बारडोली)





