spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

Top 5 This Week

spot_imgspot_imgspot_img

Related Posts

“घर में नहीं दाने, अम्मा चलीं भुनाने…,”

समाज में कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो खुद तो आत्मनिर्भर नहीं है, लेकिन दुनियाँ भर की समस्याओं या दूसरों के मामलों में खुद को बहुत व्यस्त और फिक्रमंद दिखाता है…!

​इस स्थिति को हम कुछ पहलुओं से देख सकते हैं:
​विडंबना: सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जो व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरों (मामा) पर निर्भर है, वह दूसरों का मार्गदर्शन करने या उनकी चिंता करने का दावा कर रहा है…!
​पलायनवाद: कई बार जो अपनी खुद की असफलताओं या जिम्मेदारियों से बचने के लिए हार से मुँह छुपाने के लिए पलायन कर चुका हो वो “दूसरों की चिंता” को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर अपने आप को महान बताने की कोशिश करता हैं, अपनी स्थिति सुधारने के बजाय दुनियाँ की फिक्र करना ही शायद उसे मानसिक रूप से ‘बड़ा’ महसूस कराता है…!

हमारे समाज में अक्सर ऐसे लोगों को देखा जाता है, जो घर की जिम्मेदारियों में शून्य होते हैं, लेकिन मोहल्ले कि समाज कि या राजनीति की चर्चा में सबसे आगे रहते हैं…!

​ऐसे शूरमाओं को व्यंग्य की भाषा में “घर में नहीं दाने, अम्मा चलीं भुनाने” वाली कहावत के करीब भी माना जा सकता है…!

👉 सुरेश कुमार व्यास “जानम”✍️
👉 सिखवाल समाचार ®️

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles