यह बात बिल्कुल सही है कि सच का सामना करना हर किसी के बस की बात नहीं होती, अक्सर लोग वास्तविकता से बचने के लिए या तो किनारा कर लेते हैं या फिर अपनी असुरक्षा (insecurity) को छिपाने के लिए गलत व्यवहार का सहारा लेते हैं…!
इस कड़वाहट के पीछे कुछ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हो सकते हैं:
१. सुविधाजनक क्षेत्र से बाहर लोगों का सामना “कम्फर्ट ज़ोन” का टूटना:
ज़्यादातर लोग एक फर्जीवाड़े के काल्पनिक सुरक्षित दायरे में जीते हैं, जब सच सामने आता है, तो वह उनके बने-बनाए विश्वासों को हिला देता है, ऐसे में खुद को बदलने के बजाय, लोग उस सच से ही भागना आसान समझते हैं…!
२. अहंकार (Ego) को ठेस:
सच्चाई अक्सर इंसान के अहंकार के आड़े आती है, जब किसी को उसकी हैसियत, वास्तविकता, गलती या असलियत का आईना दिखाया जाता है, तो वह उसे स्वीकार करने के बजाय ‘ओछी हरकतों” या व्यक्तिगत हमलों (personal attacks) पर उतर आता है, ताकि वह खुद को श्रेष्ठ साबित कर सके…!
३. स्वीकार्यता का अभाव:
समाज में “दिखावे” का बोलबाला ज़्यादा है, ऐसे में जो इंसान ईमानदारी से कड़वा सच बोलता है, उसे लोग अक्सर “नकारात्मक” या “मुँहफट” मान लेते हैं, सच जानने के बाद लोग इसलिए भी दूर भागते हैं क्योंकि सच के साथ ज़िम्मेदारी आती है, जिसे हर कोई उठाना नहीं चाहता…!
एक विचार:
“सच कड़वा ज़रूर है, लेकिन वह एक ऐसी दवा की तरह है जो जख्म को साफ़ करती है, भले ही शुरू में जलन हो, पर अंत में सुधार वहीं से शुरू होता है…!”
👉 सुरेश कुमार व्यास ✍️
👉 सिखवाल समाचार ®️






