मैं ऐसे सनातन धर्म की रक्षा के लिये प्रतिबद्ध हूँ और अपनी अन्तिम स्वाँस तक रहूँगा…!
यह भी एक प्रकार की गोरक्षा ही है, अपनी सास के कर्मेंद्रियों की रक्षा, अपने और दूसरे के शरीर के इंद्रियों की रक्षा करने वाला भी गो-रक्षक ही माना जाना चाहिए…!
एक बहु द्वारा सास के भार का वहन करना ही सनातन धर्म है, और यह धर्म अतुलनीय रूप से श्रेष्ठ है, यही हमारीं संस्कृति हैं यह ही हमारीं परम्पराएँ हैं…!
गोरक्षा के नाम पर केवल गाय ही नहीं क्यूँकि गाय को तो हम देवताओं की श्रेणी में रखते हैं, अपनी माँ के स्थान पर देखते हैं और सास भी धर्म की माँ ही होती हैं, इसलिए सास की सेवा भी गौसेवा जैसा ही पुण्य काम हैं, हम अपने आचरण को सुधारें, हम अपनी मनोवृत्तियों को सुधारें और अपना तथा सकल समाज का उत्थान करें…!
!! जय ऋष्यराज की👏 !!
!! माता शाँता की जय👏 !!






