किसी भी समाज की पहचान केवल उसके वैभव, संख्या या भवनों से नहीं होती, बल्कि उसके संस्कार, अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी से होती है, जब समाज स्वयं अपनी परंपराओं में समयानुकूल सुधार करता है, तभी वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनता है…!
चित्र में दर्शाए गए निर्णयों से समाज को कुछ महत्वपूर्ण सामाजिक सुधारों का संकल्प लेना होगा, जैसे मृत्यु भोज अवश्य करें लेकिन उसमें अनावश्यक खर्च पर रोक, विवाह समारोहों में फिजूलखर्ची कम करना, अफीम एवं अन्य नशों पर प्रतिबंध, रंग कि चोलिया जैसी अनुचित परंपराओं को समाप्त करना तथा नियमों का उल्लंघन करने वालों पर सामाजिक दायित्व तय करना, ऐसे निर्णय केवल नियम नहीं, बल्कि समाज को नई दिशा देने वाले संकल्प बन सकते है…!
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दिखावे की होड़ छोड़कर शिक्षा, संस्कार, स्वास्थ्य और समाज सेवा को प्राथमिकता दें, लाखों रुपये रस्मों और आडंबर पर खर्च करने के बजाय यदि वही धन बच्चों की शिक्षा, गरीब परिवारों की सहायता, छात्रवृत्ति, चिकित्सा या समाज के विकास कार्यों में लगाया जाए, तो समाज की वास्तविक प्रगति संभव है, जिसका एक उदाहरण “अहमदाबाद में स्थित सिखवाल ब्राह्मण सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट” हैं, और दूसरा उदाहरण फर्जी घोषणाओं से सुसज्जित तथा समाज के धन का दुरुपयोग “लेबड़” वर्तमान में समाज के सामने हैं…!
परंपराएँ हमारी संस्कृति की धरोहर हैं, लेकिन हर परंपरा समय की कसौटी पर खरी उतरे, यह आवश्यक नहीं, जो परंपरा समाज पर आर्थिक, मानसिक या सामाजिक बोझ बन जाए, उसमें सुधार करना ही सच्ची समाज सेवा है, सुधार का विरोध नहीं, बल्कि उसका स्वागत होना चाहिए…!
समाज तभी मजबूत होगा जब प्रत्येक व्यक्ति यह समझे कि सम्मान खर्च से नहीं, संस्कार से मिलता है, सादगी में भी गरिमा होती है और अनुशासन में ही समाज की शक्ति छिपी होती है…!
आइए, हम सभी संकल्प लें:
“दिखावे से नहीं, विचारों से समाज महान बनेगा, फिजूलखर्ची नहीं, शिक्षा और सेवा हमारी पहचान बनेगी…!
परंपरा का सम्मान होगा, लेकिन समाजहित सर्वोपरि रहेगा…!”
यही जागरूक समाज की पहचान है और यही आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे बड़ी विरासत होगी…!
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण” – समाज को “अर्पण”






