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सुन कर औरों की व्यथा…,

सुन कर औरों की व्यथा,
जब नेत्र हो जाते सजल,
तब मेरे व्याकुल ह्रदय से,
फूट पड़ती हैं गजल…!

हर बार कोई छीन कर,
ले जाता हैं मेहनत का फल,
इस बार किस उम्मीद में,
फिर उसने बोयी थी फ़सल…!

पत्थरों को साक्ष्य रख कर,
रो लिया करते हैं हम,
देवता होते तो उनका,
दिल न जाता था दहल…!

भूगर्भ से जब भी उठा,
ज्वालामुखी तो समझलो,
विद्रोह शोषण के विरुद्ध,
अब हो गया कोई सफल…!

परिणाम की चिंता नही,
बलिदान की जब ठान ली,
मैं नही करता तो कोई,
और करता था यह पहल…!

तुच्छ हूँ यह जानकर,
मुझको न ठुकराना कभी,
झोपड़ी ने ही बनायें,
और गिराये हैं महल…!

श्रीमतों को तो,
सूरा और सुंदरी को छोड़ कर,
चेतना झकझोरने वाली,
नही आती कोई गजल…!

भँवरलाल उपाध्याय “भँवर”

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