घर का खाना और बाहर का खाना इन दोनों में वही अंतर है जो अपनी जेब और सरकारी योजना में होता है…!
घर में आदमी रोटी ऐसे खाता है जैसे राशन विभाग ने लिमिट तय कर रखी हो, “बस दो रोटी, दाल लो, सब्ज़ी खत्म मत करो, रात के लिए भी बचानी है…!”
यही आदमी जैसे ही किसी दूसरे के घर, शादी-भोज या भंडारे में पहुंचता है, उसके भीतर छिपा हुआ खाद्य मंत्रालय जाग जाता है, वह प्लेट लेकर ऐसे निकलता है, जैसे आज नहीं खाया तो अगला भोजन सीधे कलयुग समाप्त होने पर ही मिलेगा…!
घर में जो आदमी आधी कटोरी खीर देखकर बोलता है, “मुझे मीठा ज्यादा पसंद नहीं” वही आदमी बाहर जाकर खीर के भगोने के पास ऐसे मंडराता है, जैसे मधुमक्खी फूल पर मँडराती हैं…!
सबसे मज़ेदार दृश्य तो शादी-ब्याह में होता है, व्यक्ति पहले पूरे मैदान का सर्वे करता है, कँहा पनीर है, कँहा मिठाईयाँ है, कँहा आइसक्रीम है, और कँहा वह आइटम रखा है, जिसका नाम कोई नहीं जानता पर दिखने में महंगा लगता है…!
फिर शुरू होता है “ऑपरेशन दबा-दबा कर भोजन” प्लेट में चीजें ऐसे सजाई जाती हैं, जैसे आदमी खाने नहीं बल्कि दुकान खोलने आया हो…!
पापड़ ऊपर, सलाद किनारे, नीचे चार सब्जियां, बीच में पुलाव और मिठाई को सुरक्षित क्षेत्र में रखा जाता है ताकि कोई नजर न लगा दे…!
घर में माँ बोले “एक रोटी और ले लो” तो तुरंत उत्तर आता है “नहीं-नहीं पेट भर गया…!”
बाहर वही व्यक्ति तीसरी बार नान लेते हुए वेटर से कहता है,
“भाई नान पतली कड़क और गर्म देना, मक्खन थोड़ा ज्यादा लगाना…!”
कुछ लोग तो इतने दूरदर्शी होते हैं कि खाते-खाते अगली खेप की रणनीति भी बना लेते हैं, पहले नमकीन निपटाओ, फिर मीठे पर आक्रमण करो, उसके बाद आइसक्रीम से अंतिम विजय प्राप्त करो…!
अंत में सौंफ खाते हुए ऐसा चेहरा बनाते हैं, जैसे भोजन पर कोई बहुत बड़ा उपकार कर दिया हो…!
कई बार तो आदमी अपनी सामान्य क्षमता से दुगुना-तिगुना “चार्ज” कर लेता है, चलते समय पेट आगे निकल जाता है और व्यक्ति पीछे, फिर भी मुंह से यही निकलेगा “आज तो कुछ खाया ही नहीं, भीड़ बहुत थी…!”
सच्चाई यह है कि भारतीय आदमी के भीतर एक अद्भुत प्रतिभा होती है, घर में वह संयमी योगी बना रहता है और शादी पार्टी या भंडारे में पहुंचते ही खाद्य योद्धा में परिवर्तित हो जाता है, हंसता है, खिलखिलाता है, फड़फड़ाता है और खाने पर ऐसा टूटता है जैसे बचपन का बदला लेने आया हो…!
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®️
सत्य का “दर्पण” समाज को “अर्पण”






