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विश्वासघात…,

बिना जाँचे परखें किसी इँसान पर विश्वास करने वाला एक दिन विश्वासघात का शिकार अवश्य होता है…!✍️

“नस्लविहीन श्वान एक दिन अपने मालिक को ही काटता है प्रत्येक समाज में अक्सर यह कहावत सुनने को मिलती है…!”

यह केवल किसी पशु के स्वभाव की बात नहीं हैं, बल्कि इंसानों के चरित्र और व्यवहार पर भी यह गहरा व्यंग्य है…!

कुछ लोग निजी स्वार्थ, लालच, उधार की रकम प्राप्त करने के लिए अथवा अवसरवादिता के कारण किसी का साथ तो पकड़ लेते हैं, लेकिन उनके भीतर निष्ठा, संस्कार और कृतज्ञता नहीं होती हैं, ऐसे लोग जब तक अपना मतलब निकालना होता हैं, तब तक अत्यंत वफादार बनने का अभिनय करते हैं, परन्तु जैसे ही समय बदलता है, वही लोग अपने हित के लिए उसी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने लगते हैं, जिसने उस पर अटूट भरोसा किया…!

इतिहास और समाज दोनों इस बात के गवाह हैं कि विश्वासघात हमेशा अपनों से ही मिला है, बाहरी शत्रु जितना नुकसान नहीं पहुँचाता, उससे अधिक पीड़ा वह व्यक्ति देता है जिसे आपने अपने घर, अपने दिल और अपने विश्वास में स्थान दिया हो…!

आज के समय में कई लोग थोड़े लाभ, पद, धन या प्रसिद्धि के लिए अपने शुभचिंतकों, परिजनों, यँहा तक की माँ-बाप के विरुद्ध भी खड़े हो जाते हैं, ऐसे लोगों का चरित्र अवसरवादी होता है, वे समय निकल जाने पर एहसान भूल जाते हैं, और अपने स्वार्थ के लिए तथा उधार की रकम का भुगतान न करना पड़ें, व्यक्तिगत संबंधों को भी दांव पर लगा देते हैं…!

यह कहावत हमें एक महत्वपूर्ण सीख देती है कि विश्वास हमेशा पात्र व्यक्ति पर ही करना चाहिए…!

जिस व्यक्ति के संस्कार, विचार और नीयत कमजोर हों, उससे अधिक निकटता अंततः दु:ख ही देती है, जो लोग अपने माँ-बाप के भी नही हो सकते ऐसे लोगों पर विश्वास करने पर एक न एक दिन उनसे विश्वासघात का सामना करना ही पड़ता हैं…!

सच्चा और संस्कारी व्यक्ति कभी अपने हितैषी का अहित नहीं सोचता, दुःख में या बुरे समय में कि गयी तन-मन-धन की मदद करने वालों के संग वह कठिन परिस्थितियों में भी वफादारी निभाता है…!

लेकिन हल्की सोच और कमजोर चरित्र, धन के लिए किसी भी स्तर कर गिर जाने वाला व्यक्ति अवसर मिलते ही अपना असली रूप दिखा देता है…!

इसलिए जीवन में लोगों की ऊपरी चमक-दमक नहीं, बल्कि उनका असली चरित्र पहचानना आवश्यक है, क्योंकि वफादारी धन से नहीं, संस्कारों से पैदा होती है…!

सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®️
सत्य का “दर्पण” समाज को “अर्पण”

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