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इंसान की भाषा ही उसके संस्कार का आईना होती है…!

किसी भी मनुष्य की पहचान केवल उसके वस्त्र, धन या पद से नहीं होती, बल्कि उसकी वाणी से होती है, इंसान की भाषा उसके संस्कार, विचार और व्यक्तित्व का सच्चा आईना होती है, जिस प्रकार साफ़ दर्पण चेहरे की वास्तविक छवि दिखाता है, उसी प्रकार व्यक्ति की बोली भी उसके भीतर बसे संस्कारों को उजागर कर देती है…!

मीठे शब्द टूटे हुए रिश्तों को भी जोड़ सकते हैं, जबकि कटु वचन बने-बनाए संबंधों को तोड़ देते हैं, जिस व्यक्ति की भाषा में विनम्रता, सम्मान और संयम होता है, वह हर जगह आदर पाता है, वहीं अभद्र, अहंकारी और अपमानजनक भाषा बोलने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे लोगों के दिलों से उतर जाता है…!

संस्कार केवल किताबों से नहीं आते, बल्कि परिवार, समाज और संगति से विकसित होते हैं। जिस घर में बड़ों का सम्मान, प्रेम और शिष्टाचार सिखाया जाता है, वहाँ बच्चों की भाषा में भी मर्यादा दिखाई देती है, इसलिए कहा जाता है कि “बोलने से पहले शब्द इंसान के गुलाम होते हैं, लेकिन बोलने के बाद इंसान शब्दों का गुलाम बन जाता है…!”

आज सोशल मीडिया के दौर में लोग बिना सोचे-समझे कटु शब्दों का प्रयोग कर देते हैं, कुछ लोग लोकप्रियता पाने के लिए अपमानजनक भाषा का सहारा लेते हैं, लेकिन यह क्षणिक प्रसिद्धि अंततः उनके संस्कारों की वास्तविकता सबके सामने ला देती है, सभ्य भाषा केवल दूसरों को सम्मान नहीं देती, बल्कि स्वयं के व्यक्तित्व को भी ऊँचा बनाती है…!

महान व्यक्तियों की सबसे बड़ी पहचान उनकी मधुर वाणी रही है, भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में वाणी की मधुरता और संयम का महत्व बताया है, मीठी बोली से शत्रु भी मित्र बन सकता है, जबकि कठोर भाषा अपने लोगों को भी दूर कर देती है…!

इसलिए हमें हमेशा ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो प्रेम, सम्मान और संस्कारों की सुगंध फैलाए, क्योंकि इंसान की असली खूबसूरती उसके चेहरे में नहीं, उसकी वाणी और व्यवहार में छिपी होती है…!

सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®️
सत्य का “दर्पण” समाज को “अर्पण”

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