शिक्षा सिर्फ़ स्कूल में नहीं, जीवन की पाठशाला में भी मिलती है…!
डिग्री ज्ञान का प्रमाण हो सकती है, लेकिन जीवन का हर ज्ञान डिग्री से नहीं मिलता, कुछ बातें किताबें सिखाती हैं, तो कुछ परिस्थितियाँ, परिवार, संस्कार और अनुभव जीवन भर के शिक्षक बन जाते हैं…!
आज समाज में एक बड़ी भूल यह हो रही है कि हम किसी व्यक्ति की योग्यता का मूल्यांकन उसके प्रमाण-पत्रों से करने लगे हैं, जिसके पास बड़ी डिग्री है, उसे विद्वान मान लिया जाता है, और जिसके पास अनुभव है, उसे अक्सर कमतर आँका जाता है, जब कि बुद्धिजीवी वर्ग शिक्षित होते हुए भी असंवैधानिक अनैतिक समाज को बाँटने वालो का समर्थन करते देखे गये हैं, जबकि कम शिक्षित बुजुर्गों (पंचों) द्वारा सामाजिक हित में समय-समय पर कई अद्भुत कार्यों को मंजिल तक पहुँचाने का शोभाग्य प्राप्त करते देखे गये…!
एक बस में यात्रा के दौरान यही बहस छिड़ी कि शिक्षा कहाँ से मिलती है…?
कॉलेज के प्रोफेसर का मत था कि वास्तविक शिक्षा विद्यालय और विश्वविद्यालय से प्राप्त होती है, वहीं अधिकांश यात्रियों का कहना था कि शिक्षा का सबसे बड़ा विद्यालय जीवन है, जहाँ संस्कार, संघर्ष और अनुभव इंसान को वह सिखाते हैं जो किसी पुस्तक में नहीं लिखा होता…!
इसी बीच बस खराब हो जाती है, एक साधारण यात्री बस को ठीक करने का प्रयास करता है, लेकिन प्रोफेसर उसे रोकते हुए कहते हैं “आप मैकेनिकल इंजीनियर नहीं हैं, इसलिए बस ठीक नहीं कर सकते…!”
समय बीतता है, बस वहीं खड़ी रहती है, अब वही युवा यात्री सभी की उम्मीद बन जाता है, यात्रियों के आग्रह पर वह बस का इंजन देखता है और कुछ ही देर में बस चल पड़ती है…!
अब प्रोफेसर आश्चर्य से पूछते हैं “आपने यह कहाँ सीखा…?”
युवा यात्री मुस्कुराकर उत्तर देता है “अपने पिताजी की वर्कशॉप में…!”
यही इस घटना का सबसे बड़ा संदेश है…!
जीवन में हर ज्ञान विश्वविद्यालय की चारदीवारी से नहीं आता, अनेक बार पिता की कार्यशाला, माँ की रसोई, किसान का खेत, कारीगर की दुकान, सैनिक की चौकी और मजदूर का पसीना ऐसी शिक्षा दे जाते हैं, जिसे कोई डिग्री नहीं दे सकती, इंजीनियर बहुत ही लाजवाब नक्शा बना कर दे सकता है, लेकिन उस नक्शे को साक्षात स्वरूप देने वाले मजदूर डिग्री धारक नही होते है…!
डिग्री सम्माननीय है, लेकिन अनुभव अमूल्य है, प्रमाण-पत्र अवसर दिला सकता है, परंतु संस्कार और व्यवहार ही व्यक्ति को सम्मान दिलाते हैं…!
समाज को यह समझना होगा कि शिक्षा और बुद्धिमत्ता एक ही बात नहीं हैं, शिक्षित होना आवश्यक है, लेकिन अनुभवी होना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, जो व्यक्ति जीवन की पाठशाला से सीखता है, वह परिस्थितियों में समाधान ढूँढ़ता है, उसे सामाजिक परिवेश की जानकारी होती हैं, जबकि केवल पुस्तकीय ज्ञान रखने वाला सेवानिवर्ती के पश्चात समाज में पर्दापण करने वाला व्यक्ति कई बार समस्या के सामने असहाय खड़ा रह जाता है…!
इसलिए कभी भी किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके पहनावे, पद या डिग्री से मत कीजिए, हो सकता है, जिस व्यक्ति को आप साधारण समझ रहे हों, वही किसी कठिन समय में आपका सबसे बड़ा सहारा बन जाए…!
याद रखिए:
विद्यालय आपको अक्षरज्ञान देता है,
परिवार आपको संस्कार देता है,
संघर्ष आपको अनुभव देता है,
और यही तीनों मिलकर मनुष्य को वास्तव में शिक्षित बनाते हैं…!
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण” – समाज को “अर्पण”





