“मौत, मुकदमा, मांदगी, मंदी अर मकान…,”
“मौत, मुकदमा, मांदगी, मंदी अर मकान।
पांचों ‘म’ मा जै लगे तो, सहाय करै भगवान।।“
हमारे बुजुर्गों ने जिंदगी को किताबों से नहीं, बल्कि अनुभवों से समझा था, उनकी कही हुई छोटी-सी बात में भी जीवन का बहुत बड़ा दर्शन छिपा होता था, ऐसी ही एक कहावत है: “मौत, मुकदमा, मांदगी, मंदी अर मकान…!”
ये पांचों शब्द केवल परिस्थितियां नहीं हैं, बल्कि मनुष्य की आर्थिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक परीक्षा लेने वाले पांच पड़ाव हैं…!
- मौत: सबसे बड़ा खालीपन
परिवार में किसी अपने की मृत्यु केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं होती, बल्कि घर की पूरी दुनिया बदल जाती है, मृत्यु के बाद होने वाले संस्कार और भोज अपनी जगह सामाजिक परंपरा हैं, लेकिन उस समय परिवार का मन दु:ख और शोक से भरा होता है…!
ऐसे समय में दिखावे, प्रतिष्ठा और खर्च से ज्यादा जरूरी है, दुःखी परिवार के साथ खड़ा होना, जिस घर में चूल्हा दु:ख से ठंडा हो, वहां समाज को भोजन की आलोचना नहीं, अपनत्व की गर्माहट देनी चाहिए…!
- मुकदमा: तारीखों के बीच गुजरती जिंदगी
अदालत का मुकदमा केवल कागज और वकील तक सीमित नहीं रहता, वह वर्षों तक मनुष्य का समय, धन और मानसिक शांति खाता रहता है…!
एक तारीख आती है, फिर दूसरी तारीख आती है और देखते ही देखते वर्षों का जीवन इंतजार में निकल जाता है…!
इसीलिए समझदारी इसी में है कि हर विवाद को अदालत तक ले जाने से पहले संवाद, समझदारी और आपसी समाधान का रास्ता तलाशा जाए, क्योंकि कई बार मुकदमे में जीतने वाला भी वर्षों की शांति हार चुका होता है…!
- मांदगी: बीमारी केवल शरीर की नहीं होती
लंबी बीमारी व्यक्ति के शरीर को ही नहीं, पूरे परिवार को थका देती है, दवाइयों का खर्च, अस्पतालों के चक्कर, सेवा करने वालों की चिंता और भविष्य का डर, इन सबके बीच परिवार धीरे-धीरे मानसिक रूप से भी कमजोर पड़ने लगता है, ऐसे समय में बीमार व्यक्ति को ताना नहीं, सहारा चाहिए…!
समाज की असली संवेदनशीलता तब दिखाई देती है जब वह किसी बीमार परिवार के पास केवल हाल पूछने नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर मदद करने पहुंचता है…!
- मंदी: जब कमाई छोटी और चिंता बड़ी हो जाए
व्यापार में मंदी, नौकरी का संकट या आय का कम हो जाना मनुष्य को भीतर तक हिला देता है…!
जिस घर में कल तक भविष्य की योजनाएं बन रही थीं, वहां अचानक खर्चों की गिनती शुरू हो जाती है…!
मंदी हमें सिखाती है कि धन जरूरी है, लेकिन धन ही जीवन नहीं है, बुरे समय में बचत काम आती है, लेकिन उससे भी ज्यादा काम आते हैं, परिवार के रिश्ते, मित्रों का सहयोग और मनुष्य का धैर्य…!
आज किसी का कारोबार मंदा है तो कल परिस्थितियां बदल भी सकती हैं, इसलिए आर्थिक कठिनाई में किसी का मजाक नहीं, उसका हौसला बढ़ाना चाहिए…!
- मकान: सपनों की नींव और चिंता की दीवारें
हर व्यक्ति का सपना होता है कि उसका अपना घर हो, लेकिन मकान बनाना केवल ईंट, सीमेंट और लोहे का काम नहीं है…!
जमीन, नक्शा, निर्माण, मजदूरी, सामग्री, बढ़ता खर्च, कर्ज और रोज की नई जरूरतें, इन सबके बीच मकान बनाते-बनाते कई बार इंसान खुद ही थक जाता है…!
इसलिए बुजुर्गों की सीख थी:
“मकान बड़ा हो या छोटा, घर में मन बड़ा होना चाहिए…!”
क्योंकि आलीशान मकान भी सूना है, अगर उसमें प्रेम, सम्मान और अपनापन नहीं है…!
जब पांचों ‘म’ जिंदगी में एक साथ आ जाएं…,
कल्पना कीजिए: घर में किसी अपने की मृत्यु हो जाए, अदालत का मुकदमा चल रहा हो, परिवार में कोई लंबे समय से बीमार हो, कारोबार मंदा पड़ गया हो और उसी समय मकान बनाने का खर्च सिर पर हो…?
तब मनुष्य के पास धन कम पड़ सकता है, समय कम पड़ सकता है, धैर्य जवाब दे सकता है, और कभी-कभी अपने लोग भी दूर हो सकते हैं…!
ऐसे समय में इंसान के मुंह से अनायास यही निकलता है:
“हे भगवान…!
अब तू ही संभाल…!”
इसीलिए हमारे बुजुर्गों ने कहा:
“पांचों ‘म’ मा जै लगे तो, सहाय करै भगवान…!”
लेकिन इस कहावत का अर्थ केवल भगवान से सहायता मांगना नहीं है, इसका एक सामाजिक संदेश भी है…!
जब किसी के जीवन में कठिन समय आए, तो उसे अकेला मत छोड़ो…!
सुख में साथ खड़े होने वाले तो बहुत मिल जाएंगे, लेकिन दुःख में कंधा देने वाला ही सच्चा अपना होता है…!
मृत्यु के समय संवेदना बनिए,
मुकदमे में सही सलाह बनिए,
बीमारी में सहारा बनिए,
मंदी में हौसला बनिए,
और मकान बनाते समय सहयोगी बनिए…!
क्योंकि ईश्वर हर जगह स्वयं नहीं पहुंच सकता, इसलिए शायद उसने इंसान को इंसान का सहारा बनने के लिए बनाया है…!
धन चला जाए तो वापस आ सकता है,
मकान फिर बन सकता है,
मंदी फिर दूर हो सकती है,
मुकदमा कभी खत्म हो सकता है,
बीमारी भी ठीक हो सकती है,
लेकिन कठिन समय में किसी टूटे हुए इंसान का हाथ छोड़ दिया जाए, तो वह भरोसा शायद फिर कभी वापस न आए…!
इसलिए बडेरा री बात आज भी उतनी ही सच्ची है:
“मौत, मुकदमा, मांदगी, मंदी अर मकान।
पांचों ‘म’ मा जै लगे तो, सहाय करै भगवान।।“
और जब भगवान किसी की मदद करने आए, तो जरूरी नहीं कि वह चमत्कार करे, कई बार वह किसी इंसान के रूप में हमारे सामने खड़ा होता है…!
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”





