Sampadkiy/संपादकीय: हमारी संस्कृति हमारी धरोहर, हमारी भाषा हमारा जीवन
सीरावण, कलेवो, दोपहरियो और ब्यालू यह चार शब्द हमारी राजस्थानी संस्कृति कि एक पूरी जीवनशैली है…!
भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं होती, भाषा अपने भीतर समाज का इतिहास, संस्कार, रहन-सहन और पीढ़ियों की स्मृतियाँ समेटे रहती है, हमारे बुजुर्गों की बोली में ऐसे असंख्य शब्द हैं, जिनके पीछे एक पूरा जीवन-दर्शन छिपा हुआ है…!
राजस्थानी-मरवाड़ी संस्कृति में भोजन के समय के लिए बोले जाने वाले चार शब्द:
- “सीरावण”,
- “कलेवो”,
- “दोपहरियो” और
- “ब्यालू”
यह सिर्फ चार नाम नहीं हैं, ये हमारी उस पारंपरिक जीवन-पद्धति के प्रतीक हैं, जिसमें दिनचर्या प्रकृति, श्रम, परिवार और अनुशासन के साथ चलती थी…!
- “सीरावण”: दिन की शुरुआत का संस्कार…,
सुबह का समय केवल सूर्योदय का समय नहीं था, यह दिन की शुरुआत का समय था, घर में चूल्हा जलता, ताजा भोजन बनता और परिवार अपने दिन के काम की तैयारी करता…!
“सीरावण” शब्द उस शुरुआती भोजन की याद दिलाता है, जब शरीर को दिनभर के श्रम के लिए ऊर्जा दी जाती थी, भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि दिन को स्वस्थ और सक्रिय बनाने का माध्यम माना जाता था…!
- “कलेवो”: भोजन में अपनापन…,
हमारे यहाँ “कलेवो” का अपना अलग ही भाव है, कलेवो सुनते ही गांव का घर, आंगन, चूल्हा और परिवार की आत्मीयता आंखों के सामने आ जाती है…!
पहले घर में आने वाले अतिथि से सबसे पहले यही पूछा जाता था “कलेवो कर ल्यो…?”
यह प्रश्न केवल भोजन का निमंत्रण नहीं था, बल्कि अपनत्व की अभिव्यक्ति था, आज हमारे पास भोजन के लिए बड़े-बड़े होटल हैं, लेकिन वह आत्मीयता कहाँ है, जहाँ पड़ोसी के घर से आई रोटी भी अपने घर की रोटी जैसी लगती थी…?
- “दोपहरियो”: श्रम के बीच परिवार…,
“दोपहरियो” यानी दोपहर का भोजन: राजस्थान की गर्म जलवायु और मेहनतकश जीवन में दोपहर का भोजन विशेष महत्व रखता था, खेत से लौटकर परिवार साथ बैठता, मोटे अनाज की रोटी, दाल, छाछ, सब्जी और घर का सादा भोजन खाता…!
भोजन साधारण था, लेकिन रिश्तों में स्वाद था, आज मेज पर पकवानों की संख्या बढ़ गई है, मगर कई घरों में एक साथ बैठकर खाने का समय घट गया है, मोबाइल की स्क्रीन ने कई बार उस थाली के बीच की बातचीत तक छीन ली है…!
- “ब्यालू”: दिन का अंतिम अपनापन..,
और फिर आता था ब्यालू, ब्यालू केवल रात का खाना नहीं था, यह पूरे दिन की भागदौड़ के बाद परिवार के एक साथ बैठने का अवसर था…!
दिनभर खेत, व्यापार, नौकरी या घरेलू काम में व्यस्त रहने वाले लोग शाम को घर लौटते और ब्यालू के समय परिवार के साथ बैठते, दिनभर की बातें होतीं, बुजुर्गों के अनुभव सुने जाते और बच्चों को संस्कार मिलते…!
आज “डिनर” है, लेकिन क्या हर घर में ब्यालू बचा है…?
शब्द बदलना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन शब्दों के साथ यदि परंपरा, व्यवहार और संस्कार भी बदल जाएँ, तब चिंता जरूर होनी चाहिए…!
शब्द बचेंगे तो स्मृतियाँ बचेंगी…,
हमारी नई पीढ़ी “ब्रेकफास्ट”, “लंच” और “डिनर” को सहजता से समझती है, लेकिन सीरावण, कलेवो, दोपहरियो और ब्यालू जैसे शब्द धीरे-धीरे उसके शब्दकोश से गायब होते जा रहे हैं…!
हमें अंग्रेजी या किसी भी भाषा के शब्दों से कोई विरोध नहीं होना चाहिए, भाषा जितनी समृद्ध होगी, समाज उतना ही समृद्ध होगा, लेकिन आधुनिकता के नाम पर अपनी जड़ों को भूल जाना भी समझदारी नहीं है…!
क्योंकि जिस दिन हमारी अगली पीढ़ी पूछेगी…?
“दादा सा, ब्यालू क्या होता है…?”
और हमारे पास बताने वाला कोई नहीं होगा, उस दिन केवल एक शब्द नहीं खोएगा, बल्कि उसके साथ हमारी संस्कृति का एक छोटा-सा अध्याय भी खो जाएगा…!
इसलिए आवश्यकता है कि हम अपनी लोकभाषा के इन शब्दों को घर में बोलें, बच्चों को इनके अर्थ समझाएँ और अपनी संस्कृति को केवल पुस्तकों या सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित न रखें…!
“सीरावण” हमारी “सुबह” है,
“कलेवो” हमारी “आत्मीयता” है,
“दोपहरियो” हमारी “पारिवारिक परंपरा” है,
और “ब्यालू” हमारे “रिश्तों की शाम” है…!
ये शब्द हमारी बोली के शब्द भर नहीं, हमारी पीढ़ियों की विरासत हैं…!
आइए, आधुनिकता को अपनाएँ, लेकिन अपनी जड़ों को न छोड़ें…,
थाली बदल सकती है,
भोजन बदल सकता है,
समय बदल सकता है,
जीवनशैली बदल सकती है,
लेकिन अपनी बोली, संस्कृति और संस्कारों को मिटने न दें…!
क्योंकि…,
“जिस समाज को अपनी बोली के शब्द याद रहते हैं, वो समाज अपनी जड़ों का पता कभी नहीं भूलता…!”
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®*
सत्य का “दर्पण” समाज को “अर्पण”





