SAMPADKIY/संपादकीय : “अपनी आदतों के अनुसार चलने में इतनी गलतियाँ कभी नहीं होतीं, जितनी दुनिया का लिहाज़ और ख़्याल रखकर चलने में होती हैं…!”
समाज में रहते हुए दूसरों का सम्मान करना हमारी संस्कृति है, लेकिन हर किसी को खुश रखने की कोशिश करना हमारी जिम्मेदारी नहीं है, अक्सर इंसान अपनी इच्छाओं, सिद्धांतों और आत्मसम्मान को किनारे रखकर यह सोचने लगता है कि “लोग क्या कहेंगे…?”
और यहीं से उसके जीवन में अनावश्यक समझौतों का सिलसिला शुरू हो जाता है…!
दुनिया का लिहाज़ करते-करते हम कई बार अपने ही मन की आवाज़ को दबा देते हैं, जिसे मना करना चाहिए, उसे हाँ कह देते हैं, जहाँ विरोध करना चाहिए, वहाँ चुप हो जाते हैं, जहाँ गलत को गलत कहना चाहिए, वहाँ रिश्तों और प्रतिष्ठा का हवाला देकर खामोश हो जाते हैं, परिणाम यह होता है कि सामने वाला हमारी शालीनता को हमारी कमजोरी समझने लगता है…!
विडंबना यह है कि समाज में आपकी नीयत से ज्यादा आपकी सुविधा के अनुसार बनी लोगों की अपेक्षाएँ महत्वपूर्ण हो जाती हैं, आप दस अच्छे काम कर दीजिए, लेकिन ग्यारहवें काम में किसी की इच्छा के विरुद्ध चले जाइए तो वही व्यक्ति आपकी पूरी अच्छाई पर सवाल खड़ा कर देगा…!
इसलिए जीवन में एक बात समझना जरूरी है, सम्मान दीजिए, लेकिन अपने स्वाभिमान की कीमत पर नहीं, रिश्ते निभाइए, लेकिन अपने सिद्धांतों की हत्या करके नहीं, समाज का ख्याल रखिए, लेकिन अपनी आत्मा की आवाज़ दबाकर नहीं…!
हर व्यक्ति को अपनी सीमाएँ तय करनी चाहिए, हर बात पर सफाई देना, हर निर्णय पर लोगों की स्वीकृति लेना और हर कदम से पहले यह सोचना कि “लोग क्या कहेंगे…?”
यह जीवन नहीं, बल्कि दूसरों की राय के अनुसार जीया गया जीवन है, और सच तो यह है कि आप चाहे जितना अच्छा कर लें, दुनिया फिर भी कुछ न कुछ कहेगी, इसलिए बेहतर है कि दुनिया की बातों के बजाय अपने विवेक की सुनें, गलती हो तो उसे स्वीकार करें, सुधारें और आगे बढ़ें, लेकिन केवल इसलिए गलत रास्ता न चुनें कि कोई आपसे नाराज़ न हो जाए…!
समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय सही और गलत में अंतर समझ सकें, जो रिश्तों में मधुर हों, व्यवहार में विनम्र हों, लेकिन सिद्धांतों के मामले में दृढ़ हों…!
याद रखिए:
दुनिया के लिहाज़ में जीते-जीते कहीं ऐसा न हो कि एक दिन आईने के सामने खड़े होकर खुद से ही नजरें चुरानी पड़ें…!
दूसरों का सम्मान कीजिए, मगर अपने अस्तित्व का सम्मान करना मत भूलिए, क्योंकि दुनिया को खुश करने की कोई अंतिम सीमा नहीं होती, लेकिन स्वयं से संतुष्ट होकर जीने की एक स्पष्ट राह जरूर होती है…!
अंततः जीवन आपका है: फैसले भी आपके होने चाहिए, लोगों की राय सुनिए जरूर, मगर अपने विवेक को उसका गुलाम मत बनाइए…!
संपादकीय डेस्क
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
“सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”






