संपादकीय/SAMPADKIY
मंदिर भगवान को धन्यवाद देने का स्थान है, लेकिन हमने उसे अपनी इच्छाओं की सूची सौंपने का कार्यालय बना दिया है…!
हम मंदिर में जाते हैं, कभी नौकरी के लिए, कभी धन के लिए, कभी सफलता के लिए, कभी किसी अपने के लिए, लेकिन कितनी बार ऐसे भी गए हैं कि बस इतना कह सकें…!
“प्रभु…! जो दिया, उसके लिए धन्यवाद…!”
विडंबना देखिए, हम परमात्मा से बहुत कुछ मांगते हैं, लेकिन अपने भीतर झांकने के लिए कुछ क्षण भी नहीं निकालते, हम अपना वह चेहरा तो खूब सजाते हैं, जिस पर दुनिया की नजर होती है, लेकिन उस आत्मा को सजाने की कोशिश नहीं करते, जिस पर परमात्मा की नजर होती है…!
चेहरे पर मुस्कान हो और भीतर ईर्ष्या, कपड़ों में चमक हो और विचारों में अंधेरा, बातों में संस्कार हों और व्यवहार में अहंकार, तो फिर यह सजावट किसके लिए…?
दुनिया को दिखाने के लिए सजाया हुआ चेहरा कुछ समय तक प्रभावित कर सकता है,
लेकिन परमात्मा के सामने केवल कर्म और चरित्र ही दिखाई देते हैं, जीवन में तकलीफें आएंगी, हर दर्द का खुलासा करना जरूरी नहीं, हर चोट का प्रदर्शन करना जरूरी नहीं, कभी-कभी चुप रहकर मुस्कुरा देना भी आत्मबल है…!
तकलीफ का खुलासा मत होने दीजिए, मुस्कुराइए जरूर, लेकिन अपनी पीड़ा को तमाशा मत बनने दीजिए, और याद रखिए इंसान को बादशाह उसकी डिग्री नहीं, उसकी सोच बनाती है…!
किताबी ज्ञान आपको नौकरी दिला सकता है, लेकिन अच्छी सोच आपको सम्मान दिलाती है, डिग्री आपका परिचय बता सकती है, लेकिन आपका व्यवहार आपका चरित्र बताता है…!
इसलिए जीवन में इतना जरूर कमाइए कि लोग आपके पद से नहीं आपके व्यक्तित्व से आपकी पहचान करें, मंदिर में जाने से पहले मन को साफ कीजिए, दूसरों की कमियां देखने से पहले अपने भीतर झांकिए और चेहरे को सजाने से पहले आत्मा को सजाइए…!
क्योंकि दुनिया आपकी शक्ल देखती है, समाज आपका व्यवहार देखता है, लेकिन परमात्मा आपका मन देखता है, अंततः प्रश्न यह नहीं कि
हमने दुनिया को अपने बारे में क्या दिखाया…?
प्रश्न यह है कि परमात्मा की नजर में हम वास्तव में क्या हैं…?
संपादकीय✍️
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
“सत्य का दर्पण-समाज को अर्पण”





