संपादकीय/SAMPADKIY
अपनी जड़ों को जानिए, समझिए और अगली पीढ़ी तक पहुँचाइए…,
“सूर्य जब भी पश्चिम में गया है, अस्त ही हुआ है…!”
यह पंक्ति केवल किसी दिशा की आलोचना नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक रूपक है, प्रश्न पश्चिम या पूर्व का नहीं है, प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी विरासत को जाने बिना किसी दूसरे की परंपरा को आधुनिकता समझकर अपनाते जा रहे हैं…?
हमारे पूर्वजों ने पर्व-त्योहार केवल मनोरंजन के लिए नहीं बनाए थे, प्रत्येक पर्व के पीछे परिवार, प्रकृति, स्वास्थ्य, गुरु, माता-पिता, भाई-बहन, संतान, नारी, पूर्वज, ज्ञान और समाज से जुड़े संस्कारों का कोई न कोई संदेश छिपा था…!
आज आवश्यकता किसी दूसरे समाज से द्वेष करने की नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं को समझने और सम्मानपूर्वक जीवित करने की है…!
मातृनवमी: माँ के प्रति कृतज्ञता का संस्कार…,
माँ के सम्मान के लिए हमें किसी एक दिन की आवश्यकता क्यों हो…?
हमारी परंपरा में मातृत्व केवल एक रिश्ते का नाम नहीं, बल्कि त्याग, ममता, जन्म, पालन-पोषण और संस्कारों का आधार है, मातृनवमी जैसे अवसर हमें स्मरण कराते हैं कि माँ का सम्मान कैलेंडर के एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए, माँ के चरणों में सम्मान, उसकी सेवा में संस्कार और उसके चेहरे की मुस्कान में परिवार की वास्तविक समृद्धि है…!
नई पीढ़ी को Mother’s Day मनाने से रोकना उद्देश्य नहीं, उद्देश्य यह है कि वह मातृसम्मान की अपनी जड़ों को भी जाने…!
कौमुदी महोत्सव: प्रेम का भारतीय संस्कार…,
प्रेम मनुष्य की शाश्वत भावना है, लेकिन प्रेम को केवल आकर्षण, प्रदर्शन या एक दिन की औपचारिकता तक सीमित कर देना हमारी दृष्टि को छोटा कर देता है, भारतीय परंपरा में प्रेम के अनेक रूप हैं, राधा-कृष्ण का प्रेम, राम-सीता का समर्पण, शिव-पार्वती का दांपत्य, भाई-बहन का स्नेह और मित्रता में कृष्ण-सुदामा की आत्मीयता…!
हमारी संस्कृति ने प्रेम को संयम, समर्पण, निष्ठा और मर्यादा से जोड़ा, इसलिए नई पीढ़ी को प्रेम का विरोध नहीं, बल्कि प्रेम की भारतीय परिभाषा समझाने की आवश्यकता है…!
गुरुपूर्णिमा: शिक्षक से आगे गुरु का सम्मान…,
आज हम Teacher’s Day मनाते हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन क्या हमारी संतान को यह भी पता है कि गुरु शब्द का अर्थ केवल विद्यालय में पढ़ाने वाला शिक्षक नहीं है…?
गुरु वह है जो अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाए, जो जीवन जीने की दिशा दे, जो चरित्र निर्माण करे, गुरुपूर्णिमा हमें केवल शिक्षक का धन्यवाद करना नहीं, बल्कि ज्ञान परंपरा और गुरु-शिष्य संबंध का सम्मान करना सिखाती है…!
धन्वन्तरि जयन्ती: स्वास्थ्य को जीवन-दर्शन बनाना…,
आज Doctor’s Day पर चिकित्सकों का सम्मान होना चाहिए निश्चित रूप से, लेकिन साथ ही हमारी संतानों को यह भी जानना चाहिए कि भारतीय परंपरा में धन्वन्तरि को आयुर्वेद और स्वास्थ्य-परंपरा से जोड़ा गया है, हमारी संस्कृति में स्वास्थ्य केवल बीमारी ठीक करने का विषय नहीं था, आहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, संयम और प्रकृति के साथ संतुलन भी स्वास्थ्य का हिस्सा थे…!
अर्थात डॉक्टर का सम्मान भी हो और स्वास्थ्य की अपनी प्राचीन दृष्टि का ज्ञान भी जीवित रहे…!
विश्वकर्मा जयंती: श्रम, कौशल और सृजन का सम्मान…,
Technology Day मनाना आधुनिक तकनीक के महत्व को स्वीकार करना है, परंतु विश्वकर्मा जयंती हमें यह बताती है कि औजार बनाने वाला हाथ, निर्माण करने वाला कारीगर और सृजन करने वाला श्रमिक भी सम्मान का अधिकारी है, हमारी संस्कृति ने सृजनशीलता को देवत्व से जोड़ा, आज आवश्यकता है कि बच्चे केवल technology का उपयोग करना न सीखें, बल्कि यह भी समझें कि हर तकनीक के पीछे किसी मनुष्य का कौशल, श्रम और बुद्धि होती है…!
सन्तान सप्तमी: संतान नहीं, संस्कार की चिंता…,
Children’s Day बच्चों के अधिकार और खुशियों की याद दिलाता है, लेकिन हमारी परंपरा में सन्तान सप्तमी जैसे पर्व केवल संतान की प्राप्ति तक सीमित नहीं थे, इनके व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में परिवार और संतान के प्रति जिम्मेदारी का भाव दिखाई देता है, आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि हम अपने बच्चों को कितनी सुविधाएँ दे रहे हैं…!
प्रश्न यह है, क्या हम उन्हें संस्कार भी दे रहे हैं…?
महँगे विद्यालय बच्चे को शिक्षा दे सकते हैं, लेकिन परिवार ही उसे चरित्र देता है…
नवरात्रि और कन्या पूजन: नारी सम्मान का जीवंत संस्कार…,
Daughter’s Day मनाना बुरा नहीं है, लेकिन उस बेटी को यह बताना भी आवश्यक है कि जिस संस्कृति में वह जन्मी है, वहाँ कन्या को देवीस्वरूप मानकर पूजन की परंपरा रही है, नवरात्रि में शक्ति के विविध रूपों का स्मरण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि नारी जीवन, शक्ति, सृजन और संरक्षण की आधारशिला है…!
लेकिन यहाँ हमारी परीक्षा भी है, कन्या के चरण पूजने से पहले उसके अधिकार, शिक्षा, सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, यही परंपरा का वास्तविक पुनर्जागरण होगा…!
रक्षाबंधन: बहन के लिए केवल एक दिन नहीं, रक्षाबंधन में राखी केवल धागा नहीं है, यह विश्वास, स्नेह, जिम्मेदारी और पारिवारिक बंधन का प्रतीक है, यदि Sister’s Day आता है तो मनाइए, लेकिन अपनी संतान को यह भी बताइए कि हमारी बहन के साथ प्रेम और सम्मान का संस्कार किसी एक दिन का मोहताज नहीं, रक्षा का अर्थ अधिकार जमाना नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाना है…!
भाईदूज: रिश्तों को बाजार से नहीं, भावनाओं से जोड़िए…,
भाईदूज बहन-भाई के स्नेह और मंगलकामना का पर्व है, यह पर्व हमें याद दिलाता है कि रिश्ते केवल सोशल मीडिया की पोस्ट, उपहार और शुभकामनाओं से नहीं चलते, रिश्तों को समय चाहिए, संवाद चाहिए और एक-दूसरे के सुख-दुःख में खड़े होने की प्रतिबद्धता चाहिए…!
आँवला नवमी और तुलसी विवाह: प्रकृति से हमारा रिश्ता…,
आज Environment Day पर पर्यावरण संरक्षण की बातें होती हैं, होनी भी चाहिए, लेकिन हमारे यहाँ प्रकृति को केवल “संसाधन” नहीं माना गया, वृक्ष, नदियाँ, पर्वत, पशु-पक्षी और वनस्पतियाँ भारतीय जीवन-दृष्टि में श्रद्धा और संरक्षण के भाव से जुड़े रहे हैं, आँवला, तुलसी और अनेक वनस्पतियों से जुड़े पर्व हमें बताते हैं कि प्रकृति के प्रति सम्मान कोई आधुनिक आविष्कार नहीं है, आज आवश्यकता है कि हम उस भावना को आधुनिक पर्यावरण विज्ञान के साथ जोड़ें…!
नारद जयंती: संवाद और समाचार की परंपरा…,
नारद जयंती को आज कुछ लोग पत्रकारिता से जोड़कर देखते हैं, लेकिन नई पीढ़ी को यह समझाना अधिक महत्वपूर्ण है कि भारतीय परंपरा में सूचना, संवाद, संदेश और लोकसंचार की अवधारणाएँ अत्यंत पुरानी हैं…!
पत्रकारिता का वास्तविक धर्म भी यही है, सत्य की खोज, समाज को सूचना और जनहित को प्राथमिकता, सत्य को सत्य और झूठ कहने या लिखने के लिये आदमी को पैसों से ज्यादा आत्मसम्मान को महत्व देना पड़ता हैं…!
पितृपक्ष: अपनी जड़ों को याद करने का अवसर…,
आज की पीढ़ी अपने पूर्वजों के नाम तक भूलती जा रही है, पितृपक्ष हमें अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण, कृतज्ञता और पारिवारिक वंशपरंपरा से जुड़ने का अवसर देता है, यह केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि एक प्रश्न भी है…?
“हम कौन हैं और हमें यहाँ तक पहुँचाने वाले कौन थे…?”
जिस पीढ़ी को अपने पूर्वजों का इतिहास नहीं मालूम, वह अपनी सांस्कृतिक पहचान की जड़ों से धीरे-धीरे दूर होती जाती है, इसलिए बच्चों को परिवार की वंशावली, कुल-परंपरा, गाँव, गोत्र, पूर्वजों की कहानियाँ और उनके जीवन-संघर्ष बताइए…!
नवरात्रि: नौ दिनों में नारी और शक्ति का स्मरण…,
नवरात्रि को केवल गरबा, सजावट और उत्सव तक सीमित कर देना उसके गहरे सांस्कृतिक अर्थ को छोटा करना है, यह शक्ति-उपासना का पर्व है, यह हमें याद दिलाता है कि समाज में नारी का सम्मान केवल शब्दों में नहीं, व्यवहार में होना चाहिए, यदि हम देवी की पूजा करते हैं, तो घर की बेटी को शिक्षा दें, यदि हम शक्ति की आराधना करते हैं, तो स्त्री को निर्णय का अधिकार दें, यदि हम कन्या पूजन करते हैं, तो कन्या भ्रूण हत्या और भेदभाव के विरुद्ध खड़े हों, यही पूजा की सार्थकता है…!
सवाल पश्चिम का नहीं, अपनी स्मृति का है…,
यह समझना जरूरी है कि हर आधुनिक दिवस हमारी संस्कृति का विरोधी नहीं है, Mother’s Day मनाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन मातृनवमी भूल जाना चिंता का विषय है…!
Teacher’s Day मनाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन गुरुपूर्णिमा का अर्थ न जानना चिंता का विषय है…!
Environment Day मनाने में कोई बुराई नहीं, लेकिन प्रकृति के प्रति अपनी परंपरागत जिम्मेदारी भूल जाना चिंता का विषय है…!
समस्या किसी दूसरे पर्व को मनाने में नहीं है, समस्या तब है जब हमें अपनी ही परंपराओं के नाम, अर्थ और उद्देश्य मालूम न हों…!
अब संस्कृति बचाने के लिए केवल भाषण नहीं, कार्य करना होगा…,
अगर सचमुच हमें अपनी सनातनी परंपराओं को नवजीवन देना है तो शुरुआत घर से करनी होगी…!
१. हर परिवार अपनी पारिवारिक परंपराओं की डायरी बनाए…,
कुलदेवता, कुलपरंपरा, प्रमुख पर्व, रीति-रिवाज और पूर्वजों की जानकारी लिखी जाए…!
२. बच्चों को केवल पर्व की तारीख नहीं, उसका अर्थ बताया जाए…,
“आज पूजा है” कहने के बजाय यह बताइए, “हम यह क्यों करते हैं…?”
३. विद्यालयों और समाजों में ‘अपना पर्व–अपनी कहानी’ कार्यक्रम हों…,
हर पर्व के इतिहास, सामाजिक संदेश और वैज्ञानिक/प्राकृतिक संदर्भ पर बच्चों को जानकारी दी जाए…!
४. दादा-दादी और नाना-नानी की मौखिक परंपरा रिकॉर्ड की जाए…,
उनकी कहानियाँ, लोकगीत, कहावतें और पारिवारिक अनुभव मोबाइल में रिकॉर्ड करके अगली पीढ़ी तक पहुँचाए जाएँ…!
५. पर्व को दिखावे से संस्कार की ओर ले जाएँ…,
महँगी सजावट और सोशल मीडिया प्रदर्शन से अधिक महत्वपूर्ण है, परिवार का साथ, जरूरतमंद की सहायता और परंपरा का ज्ञान…!
६. सोशल मीडिया को संस्कृति का संग्रहालय बनाइए…,
हर पर्व पर केवल “Happy…” लिखने के बजाय उसकी कथा, महत्व और सामाजिक संदेश साझा कीजिए…!
अंतिम आह्वान:
हमारी संस्कृति किसी संग्रहालय में रखी हुई पुरानी वस्तु नहीं है, यह हमारी जीवन-पद्धति है, यह हमारे परिवार की स्मृति है, यह हमारे पूर्वजों का अनुभव है, यह हमारी पहचान है, हमें आधुनिक बनना है, लेकिन अपनी जड़ों को काटकर नहीं, हमें दुनिया से सीखना है, लेकिन अपनी विरासत को भूलकर नहीं, हमें नई पीढ़ी को तकनीक देनी है, लेकिन तकनीक के साथ संस्कार भी…!
उन्हें अंग्रेजी सिखाइए,
लेकिन अपनी मातृभाषा भी सिखाइए, उन्हें आधुनिक विज्ञान पढ़ाइए, लेकिन अपनी परंपराओं के पीछे छिपे ज्ञान से भी परिचित कराइए, उन्हें दुनिया दिखाईए, लेकिन यह भी बताइए कि उनका अपना घर कहाँ है…!
क्योंकि…,
जिस पीढ़ी को अपनी जड़ों का ज्ञान नहीं होता, वह हवा के हर झोंके के साथ दिशा बदल देती है…!
आइए, हम पश्चिम को कोसने के बजाय अपनी पूर्व की विरासत को जानें, दूसरों के पर्वों से घृणा नहीं, अपने पर्वों से प्रेम करें, अंधानुकरण नहीं, सार्थक चयन करें, दिखावा नहीं, संस्कार करें, भूलना नहीं, सहेजना सीखें…!
अपने व्रत-पर्व-त्योहारों को जानिए, उनका अर्थ समझिए, उन्हें परिवार के साथ मनाइए और सबसे महत्वपूर्ण, उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुँचाइए…
क्योंकि संस्कृति तब तक जीवित रहती है, जब तक एक पीढ़ी उसे अगली पीढ़ी को केवल विरासत में नहीं देती, बल्कि उसके अर्थ के साथ सौंपती है…!
“अमृत के कलश हमारे पास आज भी हैं, आइए, उन्हें पहचानें, सँभालें और आने वाली पीढ़ियों को सौंप दें…!”👏
संपादक✍️
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
“सत्य का दर्पण-समाज को अर्पण”






