“समाज आज तक सिर्फ यही जान पाया है कि अच्छा लड़का सरकारी नौकरी करता है, और अच्छी लड़की गोरी होती है…!”
यही सोच हमारे सामाजिक मूल्यांकन की सबसे बड़ी विडंबना है, वर्षों से हम इंसान की योग्यता, चरित्र, संस्कार और व्यक्तित्व को पीछे छोड़कर दो पैमानों पर निर्णय लेते आए हैं, लड़के के लिए सरकारी नौकरी और लड़की के लिए गोरा रंग…!
क्या वास्तव में किसी युवक का अच्छा होना केवल उसकी नौकरी से तय होगा…?
क्या ईमानदारी, जिम्मेदारी, व्यवहार, परिवार के प्रति समर्पण, संघर्ष और नैतिकता का कोई मूल्य नहीं…?
आज अनेक युवा अपने कौशल, व्यवसाय, उद्यमिता और निजी क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं, फिर भी केवल इसलिए कमतर समझे जाते हैं क्योंकि उनके हाथ में सरकारी नियुक्ति पत्र नहीं है…!
दूसरी ओर, किसी युवती का मूल्य उसके रंग से क्यों तय किया जाए…?
क्या उसका ज्ञान, संस्कार, आत्मविश्वास, शिक्षा, प्रतिभा और मानवीय गुण उसके चेहरे के रंग से छोटे हैं…?
यदि ऐसा है, तो यह हमारी सोच की गरीबी है, प्रकृति की नहीं…!
विडंबना यह है कि हम आधुनिकता की बातें तो करते हैं, लेकिन रिश्ते तय करते समय आज भी पुराने और सतही मापदंडों से बाहर नहीं निकल पाते, परिणामस्वरूप योग्य युवक-युवतियाँ केवल सामाजिक धारणाओं की भेंट चढ़ जाते हैं…!
समाज को अब यह स्वीकार करना होगा कि सरकारी नौकरी सम्माननीय हो सकती है, लेकिन चरित्र से बड़ी नहीं, और सुंदरता आकर्षक हो सकती है, लेकिन संस्कार से ऊँची नहीं…!
एक स्वस्थ समाज वही है जहाँ व्यक्ति की पहचान उसके कर्म, विचार, ईमानदारी, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों से हो, न कि उसकी तनख्वाह या त्वचा के रंग से…!
समाज ने तरक्की के हजारों दावे किए, डिजिटल इंडिया बना लिया, चाँद पर पहुँच गया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) सीख ली, लेकिन विवाह के मामले में उसकी बुद्धिमत्ता आज भी दो पंक्तियों से आगे नहीं बढ़ पाई,
“लड़का सरकारी नौकरी वाला हो, और लड़की गोरी हो…!”
बस, यहीं समाप्त हो जाता है समाज का पूरा “चरित्र प्रमाणपत्र”…!
लड़का ईमानदार है या नहीं, नशा करता है या नहीं, माता-पिता का सम्मान करता है या नहीं, महिलाओं का सम्मान करना जानता है या नहीं, इन सवालों का कोई महत्व नहीं, बस सरकारी मुहर लगी हो, फिर चाहे इंसानियत की फाइल वर्षों से लंबित क्यों न हो…!
उधर लड़की के लिए भी समाज का न्याय बड़ा अद्भुत है, उसके संस्कार, शिक्षा, प्रतिभा, आत्मनिर्भरता, व्यवहार, संघर्ष और व्यक्तित्व सब एक तरफ, और चेहरे का रंग दूसरी तरफ, यदि रंग गोरा है तो सारे गुण स्वतः मान लिए जाते हैं, और यदि साँवली है तो मानो उसे अपनी योग्यता का प्रमाण जीवनभर देना पड़े…!
विडंबना यह है कि यही समाज मंचों से समानता, महिला सशक्तिकरण और आधुनिक सोच पर लंबे-लंबे भाषण देता है, लेकिन जैसे ही रिश्ते की बात आती है, सारी आधुनिकता दरवाज़े पर जूते के साथ उतार दी जाती है…!
सवाल यह नहीं कि सरकारी नौकरी अच्छी क्यों मानी जाती है, सवाल यह है कि क्या चरित्र से बड़ी कोई नौकरी हो सकती है…?
क्या ईमानदारी का कोई वेतनमान नहीं…?
क्या संवेदनशीलता किसी विभाग में भर्ती नहीं होती…?
और सवाल यह भी है कि सुंदरता का ठेका किसने गोरे रंग को दे दिया…?
प्रकृति ने तो इंसानों को अनेक रंगों में बनाया, लेकिन समाज ने एक रंग से ही आंका…!
आइए, अपनी अगली पीढ़ी को यह सिखाएँ कि:
“अच्छा लड़का वह है जो जिम्मेदार, ईमानदार और संस्कारी हो…!”
“अच्छी लड़की वह है जो आत्मसम्मानी, शिक्षित, संवेदनशील और गुणवान हो…!”
जिस दिन समाज यह समझ जाएगा, उस दिन रिश्ते भी मजबूत होंगे, परिवार भी सुखी होंगे और समाज भी वास्तव में प्रगतिशील कहलाएगा…!
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण” – समाज को “अर्पण”






