जिस समाज में गॉसिप की रफ्तार एम्बुलेंस से तेज और मदद की गति कछुए से भी धीमी हो गई है…!
समाज बड़ा जागरूक है…,
इतना जागरूक कि किसी के घर की खिड़की खुली रह जाए तो कारण भी पता कर लेता है और किसी के घर का चूल्हा तीन दिन से बंद हो, तो उसकी खबर लेने का समय नहीं है…!
कौन किसके साथ घूम रहा है…?
कौन किससे मिल रहा है…?
किसकी बहू कहाँ गई…?
किसके बेटे का किससे चक्कर चल रहा है…?
किसकी बेटी देर से घर लौटती है…?
किसके बच्चों की शादी नहीं हो रही…?
इन विषयों पर हमारे स्वयंभू सामाजिक प्रहरी इतने सक्रिय रहते हैं कि लगता है जैसे समाज सेवा का पहला और अनिवार्य पाठ ही “दूसरों की निजी जिंदगी की निगरानी” है…!
लेकिन सवाल यह है कि…?
किसके घर आज चूल्हा नहीं जला…?
कौन अपने पिता की जरूरी दवाई नहीं खरीद पाया…?
किस बेटी की पढ़ाई सिर्फ आर्थिक मजबूरी के कारण रुकने वाली है…?
कौन बीमारी, बेरोजगारी या पारिवारिक संकट से अकेला जूझ रहा है…?
इन सवालों पर अचानक समाज की आँखों पर पट्टी और कानों में रुई आ जाती है…!
समाजसेवा या समाज की “न्यूज़ एजेंसी…?”
आज कुछ लोगों ने समाजसेवा को अजीब ही व्यवसाय बना दिया है, किसी की मदद करने से पहले उसकी पूरी कहानी जानना जरूरी है, लेकिन मदद करने के बाद उस कहानी को दस लोगों तक पहुँचाना उससे भी ज्यादा जरूरी…!
किसी के घर गए: फोटो…!
किसी का सम्मान किया: फोटो…!
किसी को सहयोग दिया: फोटो…!
और यदि किसी की निजी परेशानी पता चल गई, तो फिर वह परेशानी धीरे-धीरे “सामाजिक ब्रेकिंग न्यूज़” बन जाती है…!
वाह रे समाजसेवा…!
मदद करने वाले हाथ से ज्यादा सक्रिय वह उंगली है जो मोबाइल की स्क्रीन पर फॉरवर्ड का बटन दबाती है…!
चंदा समाज के नाम, चर्चा अपने नाम…!
कुछ स्वयंभू नेता और सामाजिक सेवक समाज के नाम पर चंदा जुटाने में इतने दक्ष हो गये हैं कि लगता है समाज का विकास नहीं “चंदा संग्रह प्रतियोगिता” चल रही है…!
जहाँ वास्तविक जरूरत हो वहाँ सवाल…?
“इसमें हमें क्या मिलेगा…?”
जहाँ फोटो और प्रचार हो वहाँ उत्साह…,
“हमारा नाम सबसे ऊपर होना चाहिए…!”
जहाँ किसी जरूरतमंद छात्र-छात्राओं को छात्रवर्ती कि बात हो या मदद करनी हो वहाँ अचानक बैठक, समिति, नियम, प्रक्रिया और बजट सब याद आ जाते हैं, लेकिन कोई स्वयम्भू नेताओं के घनिष्ठ हो, करीबी हो तो उन्हें किसी प्रमाण अथवा डिग्री तथा शिक्षित होने की आवश्यकता नही है न ही किसी बैठक की आवश्यकता न कोई अन्य जानकारी की आवश्यकता नही हैं, उनके पूरे परिवार को विशेष अनुदान दिया जा सकता हैं…!
सवाल पूछना गलत नहीं है, हिसाब मांगना भी गलत नहीं है, गलत तब है जब समाज के पैसे, समाज के नाम और समाज की भावनाओं का इस्तेमाल निजी प्रतिष्ठा, गुटबाजी या अनैतिक गतिविधियों के लिए होने लगे…!
किसी की मजबूरी आपका मनोरंजन नहीं है…,
किसी परिवार में आर्थिक संकट है तो वह चर्चा का विषय नहीं, सहयोग का अवसर है…!
किसी बेटी की पढ़ाई रुक रही है तो उसकी कहानी फैलाना समाजसेवा नहीं उसकी मदद करना समाजसेवा है…!
किसी बुजुर्ग के पास दवा के पैसे नहीं हैं तो उनकी स्थिति पर टिप्पणी करना संवेदनहीनता है, उन तक दवा पहुँचाना इंसानियत है…!
किसी युवक की नौकरी चली गई है तो उसके बारे में कानाफूसी करना आसान है, उसे रोजगार का अवसर दिलाना कठिन, लेकिन सार्थक है…!
और शायद इसी कठिन काम से आज के कुछ स्वयम्भू “समाजसेवी” बचना चाहते हैं…!
अड़ंगा डालना भी एक सामाजिक अपराध है…!
हर व्यक्ति हर काम नहीं कर सकता, यह बिल्कुल स्वाभाविक है, लेकिन यदि आप किसी की मदद नहीं कर सकते तो कम से कम उसके रास्ते में पत्थर मत रखिए…!
आप सहयोग नहीं कर सकते, मत कीजिए, आप आर्थिक मदद नहीं कर सकते, कोई बात नहीं, आप समय नहीं दे सकते, ठीक है, लेकिन किसी के अच्छे काम में अड़ंगा डालना, अफवाह फैलाना, बदनाम करना या उसके प्रयासों को कमजोर करना यह कैसी समाजसेवा है…?
समाज को ऐसे सेवकों की जरूरत नहीं जो दूसरों के हाथ रोकें, समाज को ऐसे लोगों की जरूरत है जो जरूरत पड़ने पर दूसरे का हाथ थामें…!
अब खबर नहीं, खबरदारी चाहिए…,
आइए आज एक छोटा-सा सामाजिक संकल्प लें:
किसी की निजी जिंदगी को चर्चा का विषय नहीं बनाएँगे, किसी की मजबूरी को मनोरंजन नहीं बनाएँगे, किसी के परिवार की परेशानी को गॉसिप नहीं बनाएँगे, किसी की बेटी, बहू, बेटे या परिवार की निजी बातों को समाज की संपत्ति नहीं समझेंगे…!
और सबसे जरूरी:
आज किसी की चर्चा करने से बेहतर है किसी की चिंता कर लें, किसी की कमी गिनाने से बेहतर है उसकी कमी पूरी करने की कोशिश कर लें, किसी के रास्ते में अड़ंगा डालने से बेहतर है उसके रास्ते से एक काँटा हटा दें…!
क्योंकि समाज की असली पहचान यह नहीं कि उसे किस-किसकी खबर है, बल्कि यह है कि उसे किस-किस के दर्द की खबर है…!
अंततः याद रखिए:
जिस समाज में गॉसिप करने वालों की संख्या मदद करने वालों से ज्यादा हो जाए, वहाँ समाज जागरूक नहीं, सिर्फ जिज्ञासु होता है…!
और जिज्ञासा से समाज की तस्वीर बन सकती है, लेकिन इंसानियत से समाज का भविष्य बनता है…!
इसलिए आज किसी की कहानी मत बनाइए…,
किसी की जिंदगी सँवारने की कोशिश कीजिए…!
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
संपादकीय दृष्टिकोण
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”






