SAMPADKIY/संपादकीय: सत्य की राह पर निंदा से क्यों डरें…?
प्रत्येक समाज में एक अजीब विडंबना देखने को मिल रही है, जो व्यक्ति गलत को देखकर चुप रहता है, उसे अक्सर “समझदार” कहा जाता है, और जो गलत के विरुद्ध आवाज उठाता है, उसे “विवादित”, “अड़ियल” या “बदनाम करने वाला” कह दिया जाता है, किसी भी समाज में यही मानसिकता सामाजिक जागरूकता की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है…!
“सत्य की राह चलने पर निंदा और बुराई अवश्य होती है…!”
यह केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का कटु सत्य है…!
जब कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार, अनियमितता, दिखावे, पक्षपात या गलत परंपराओं के विरुद्ध आवाज उठाता है, तो सबसे पहले उसके चरित्र पर सवाल उठते हैं, उसके उद्देश्य पर संदेह किया जाता है और कभी-कभी उसके पुराने कार्यों को भी खोजकर उसे कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जाता है…!
लेकिन क्या इसलिए समाज में सत्य बोलना छोड़ देना चाहिए…?
नहीं…!
सामाजिक जीवन में विरोध से घबराकर चुप हो जाना आसान है, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए सही वातावरण तैयार करना कठिन, जो भी व्यक्ति समाज के हित में गलत के विरुद्ध खड़ा होता है, उसे यह समझना चाहिए कि हर विरोध व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं होता और हर निंदा सत्य को गलत साबित नहीं करती…!
हाँ, जागरूकता के नाम पर किसी को बदनाम करना भी उचित नहीं, सत्य के साथ प्रमाण, भाषा में संयम और उद्देश्य में समाजहित होना चाहिए, विरोध व्यक्ति से नहीं, गलत प्रवृत्ति से होना चाहिए…!
हम सभी को मिल कर एक ऐसा समाज बनाना होगा, जहाँ प्रश्न पूछने वाले को शत्रु न माना जाए, बल्कि उसकी बात को सुनकर तथ्यों की जाँच की जाए, जहाँ आलोचना को अपमान नहीं, सुधार का अवसर समझा जाए, जहाँ पद, प्रतिष्ठा और संबंधों से ऊपर न्याय, पारदर्शिता और सत्य को महत्व मिले…!
किसी की निंदा से यदि हमारे भीतर अहंकार टूटता है, धैर्य बढ़ता है और हम अपने कर्मों की समीक्षा करते हैं, तो वह निंदा भी हमारे लिए सीख बन सकती है, लेकिन यदि निंदा झूठ, द्वेष या स्वार्थ से प्रेरित है, तो उसका उत्तर प्रतिशोध नहीं, समय, सत्य और श्रेष्ठ आचरण होना चाहिए…!
समाज के नाम संदेश:
आज प्रत्येक समाज में आवश्यकता ऐसे समाजसेवकों की है जो तालियों के लिए नहीं, सच्चाई के लिए काम करें, ऐसे लोगों की है जो लोकप्रिय होने से अधिक सही होने को महत्व दें, ऐसे युवाओं की है जो गलत देखकर यह न कहें “मुझे क्या करना है…?”
याद रखिए:
चुप्पी कई बार गलत को ताकत देती है,
जबकि एक साहसिक सत्य अनेक लोगों को जागरूक कर सकता है…!
इसलिए सत्य की राह पर चलिए, निंदा से सीखिए, लेकिन निंदा से टूटिए मत, आलोचना सुनिए, लेकिन विवेक से स्वीकारिए और सबसे महत्वपूर्ण अपने कर्म इतने पारदर्शी रखिए कि समय स्वयं आपका पक्ष बन जाए…!
क्योंकि समाज बदलता है तब,
जब कोई एक व्यक्ति यह तय करता है कि…,
“गलत देखकर चुप नहीं रहूँगा,
सत्य बोलने से डरूँगा नहीं,
और समाजहित से पीछे हटूँगा नहीं…!”
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”





