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शोक संदेश: संवेदना या संदेशों की भीड़…?

सामाजिक समूहों का उद्देश्य समाज को जोड़ना, महत्वपूर्ण सूचनाएँ साझा करना और आवश्यकता के समय एक-दूसरे के साथ खड़ा होना है, किसी परिवार में दुःखद घटना होने पर शोक-संदेश के माध्यम से समाज तक जानकारी पहुँचाना निश्चित रूप से आवश्यक और उपयोगी है, यह हमारी सामाजिक व्यवस्था और मानवीय संवेदनशीलता का हिस्सा है…!

लेकिन यहाँ एक विचारणीय प्रश्न भी खड़ा होता है….?
क्या सूचना देने के बाद उसी समूह में दर्जनों, सैकड़ों संवेदना संदेश लिखते जाना वास्तव में आवश्यक है…?

मान लीजिए किसी समूह में 500 सदस्य हैं और प्रत्येक सदस्य अलग-अलग संदेश लिखकर संवेदना व्यक्त करे, तो मूल सूचना के नीचे सैकड़ों संदेशों की श्रृंखला बन सकती है, जबकि वास्तविकता यह है कि अधिकांश सामाजिक समूहों में शोकसंतप्त परिवार के सदस्य स्वयं मौजूद भी नहीं होते…!

फिर सवाल यह है कि हम संवेदना किसके लिए व्यक्त कर रहे हैं…?
परिवार के लिए या समूह में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए…?

संवेदना शब्दों की संख्या नहीं, भावना की गहराई है…!👏

किसी के दुःख में सहभागी बनने के लिए अलग से दस पंक्तियाँ लिखना आवश्यक नहीं, उसी संदेश पर एक छोटा-सा “👏” स्टीकर संदेश भी पर्याप्त हो सकता है…!

और यदि परिवार से आपके व्यक्तिगत संबंध है, तो समूह में संदेशों की संख्या बढ़ाने के बजाय व्यक्तिगत फोन, व्यक्तिगत संदेश या प्रत्यक्ष उपस्थिति कहीं अधिक अर्थपूर्ण हो सकती है…!

दुःख के समय परिवार को सैकड़ों सोशल मीडिया संदेशों से अधिक आवश्यकता होती हैं, अपनों के साथ, सहारे के दो शब्द और जरूरत पड़ने पर वास्तविक सहयोग की, लोग एक ही शहर में रह कर दाह संस्कार में तो उपस्थिति दर्ज नही करवाते मगर समूहों में भारी भरकम संवेदनाएँ व्यक्त करते हैं, इस पर चिंतन अवश्य करें…!👏

समूह संचालकों की भी सामाजिक जिम्मेदारी:

सामाजिक समूहों के एडमिन भी इस विषय पर सकारात्मक व्यवस्था बना सकते हैं, शोक की सूचना साझा होने के बाद सदस्य चाहें तो केवल 🙏 या “ॐ शांति” जैसे संक्षिप्त संकेत से अपनी संवेदना व्यक्त करें, अथवा अनावश्यक संदेशों की बाढ़ से बचें…!

इससे सूचना स्पष्ट रहेगी, समूह व्यवस्थित रहेगा और शोक संदेश के नीचे सैकड़ों औपचारिक प्रतिक्रियाओं का ढेर भी नहीं लगेगा…!

आइए संवेदना को औपचारिकता नहीं, जिम्मेदारी बनाएं…!👏

हमें यह समझना होगा कि शोक संदेश भेजना सूचना का माध्यम है, संवेदना व्यक्त करना मानवीय कर्तव्य है, लेकिन संवेदना की सार्वजनिक संख्या बढ़ाना कोई सामाजिक उपलब्धि नहीं…!👏

किसी के दुःख को अपनी डिजिटल सक्रियता का अवसर न बनाएं…!

जहाँ दो शब्द सच्चे हों, वहाँ दो सौ संदेशों की आवश्यकता नहीं, जहाँ परिवार तक संवेदना पहुँच रही हो, वहाँ दिखावे की भीड़ नहीं सच्चे अपनत्व की जरूरत है…!

समाज जागरूक बने, संवेदनशील बने और संवेदना को “मैसेज की संख्या” से नहीं, “भावना की सच्चाई” से मापे…!

यह विषय सामाजिक जनजागरण हेतु प्रेषित किया जा रहा हैं, गैरजरुरी वाद-विवाद से परहेज करते हुए, विषय पर चिंतन मंथन कर सामाजिक सहयोग करें…!👏

सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”- समाज को “अर्पण”

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