कभी यह मत सोचिए कि जीवन में संघर्ष समाप्त हो जाएंगे, जब तक जीवन है, तब तक संघर्ष हैं, बस उनका स्वरूप और कारण बदलते रहते हैं, कभी आर्थिक परिस्थितियाँ चुनौती बनकर सामने आती हैं, कभी रिश्तों की उलझनें, कभी समाज की अपेक्षाएँ और कभी स्वयं के भीतर चल रहा द्वंद्व…!
जीवन का अर्थ यह नहीं कि हमारे रास्ते में कभी कठिनाइयाँ न आएँ, जीवन का वास्तविक अर्थ तो यह है कि कठिनाइयों के बीच भी हम अपना धैर्य, विवेक, संस्कार और आत्मविश्वास बनाए रखें…!
अक्सर हम दूसरों का सुख देखकर अपने संघर्षों को बड़ा समझने लगते हैं, लेकिन सच यह है कि हर व्यक्ति अपने भीतर कोई न कोई ऐसी लड़ाई लड़ रहा होता है, जिसकी जानकारी समाज को नहीं होती, मुस्कुराता हुआ चेहरा हमेशा बेफिक्र हो, यह जरूरी नहीं…!
संघर्ष हमें तोड़ने नहीं, तराशने आते हैं, जिस प्रकार सोना अग्नि में तपकर कुंदन बनता है, उसी प्रकार इंसान कठिन परिस्थितियों से गुजरकर अधिक मजबूत, समझदार और परिपक्व बनता है…!
इसलिए जब जीवन में परेशानी आए तो यह मत पूछिए “मेरे साथ ही ऐसा क्यों…?”
बल्कि स्वयं से पूछिए “इस परिस्थिति से मैं क्या सीख सकता हूँ…?”
याद रखिए, आज की कठिनाई कल का अनुभव बनेगी और आज का संघर्ष आने वाले समय में आपकी ताकत बन सकता है, परिस्थितियाँ हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन उन परिस्थितियों का सामना किस सोच और साहस से करना है, यह हमारे हाथ में अवश्य होता है…!
समाज को भी यह समझना होगा कि किसी व्यक्ति की सफलता देखकर केवल उसके परिणामों का मूल्यांकन न करें, उसके पीछे छिपे संघर्ष, त्याग, असफलताएँ और रातों की बेचैनी को भी समझने का प्रयास करें, किसी को गिरते देखकर उपहास करने के बजाय हाथ बढ़ाएँ, क्योंकि आज वह संघर्ष कर रहा है, कल वही किसी और के संघर्ष का सहारा बन सकता है…!
अतः संघर्षों से भागिए मत, उन्हें स्वीकार कीजिए, उनसे सीखिए और आगे बढ़ते रहिए…!
क्योंकि जीवन में संघर्ष खत्म नहीं होते, लेकिन संघर्षों से लड़ते-लड़ते इंसान जरूर मजबूत हो जाता है…!
संदेश:
“रास्ते कठिन हों तो कदम रोकना समाधान नहीं, बल्कि अपने हौसले को इतना मजबूत करना है कि कठिन रास्ते भी मंजिल तक पहुँचने का माध्यम बन जाएँ…!”
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”






