“डावै तीतर, डावै स्याळ, डावै खर बोलै असराळ।डावै घघू घू-घू करै, तो लंका राज विभीषण करै।।”
यह राजस्थानी लोक-उक्ति मूलतः लोकविश्वास, शकुन, अपशकुन और परिस्थितियों के संकेतों से जुड़ी हुई है, इसका भावार्थ यह है कि प्रकृति में घटने वाली कुछ असामान्य घटनाओं या जीव-जंतुओं की विशेष आवाज़ों को पुराने समय में आने वाली बड़ी घटना का संकेत माना जाता था…!
पंक्ति का भावार्थ:
“डावै तीतर, डावै स्याळ, डावै खर बोलै असराळ।
डावै घघू घू-घू करै, तो लंका राज विभीषण करै।।”
यहाँ “डावै” का आशय सामान्यतः बाईं ओर दिखाई देना अथवा बाईं दिशा से संकेत मिलना माना गया है…!
तीतर, स्याळ (सियार), खर (गधा) और घघू (उल्लू) जैसे जीवों की विशेष गतिविधियों अथवा आवाज़ों को लोकमानस ने अलग-अलग शुभ-अशुभ शकुनों से जोड़ा…!
“तीतर” का बाईं ओर दिखाई देना,
“स्याळ” अर्थात सियार का विशेष प्रकार से बोलना,
“खर” अर्थात गधे का असामान्य ढंग से रेंकना,
और “घघू” अर्थात उल्लू का रात में लगातार “घू-घू” करना, इन सबको पुराने लोकजीवन में साधारण घटना नहीं, बल्कि किसी परिवर्तन या विपरीत परिस्थिति का संकेत माना जाता था…!
सबसे महत्वपूर्ण अंतिम पंक्ति है:
“तो लंका राज विभीषण करै।।”
रामायण की कथा में रावण के बाद विभीषण का लंका के राजा बनना, एक बड़े सत्ता-परिवर्तन का प्रतीक है, इसलिए इस कहावत का व्यापक संकेत यह है कि जब परिस्थितियाँ लगातार असामान्य संकेत देने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि सत्ता, व्यवस्था या समय का बड़ा परिवर्तन निकट हो सकता है…!
गहरा सामाजिक अर्थ:
इस कहावत को केवल अंधविश्वास के रूप में देखना इसके लोकज्ञान वाले पक्ष को छोटा कर देना होगा, पुराने समय में जब मौसम की वैज्ञानिक जानकारी, संचार के आधुनिक साधन और घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने की तकनीक उपलब्ध नहीं थी, तब ग्रामीण समाज प्रकृति, पशु-पक्षियों के व्यवहार और आसपास होने वाले बदलावों को ध्यानपूर्वक देखता था…!
इसलिए ऐसी कहावतें वास्तव में उस समय के लोक-अनुभव और सामूहिक निरीक्षण का हिस्सा थीं…!
हालाँकि आज इनके शाब्दिक शकुन-अपशकुन को वैज्ञानिक भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता, लेकिन इसका रूपकात्मक अर्थ आज भी अत्यंत प्रासंगिक है…!
जब किसी व्यवस्था में एक के बाद एक असामान्य घटनाएँ दिखाई देने लगें, जब सामान्य लोग बेचैन होने लगें, जब पुराने समीकरण टूटने लगें और जब सत्ता या नेतृत्व के प्रति लोगों का विश्वास कमजोर होने लगे, तो समझना चाहिए कि परिवर्तन की जमीन तैयार हो रही है…!
और यही “विभीषण के लंका राज” का प्रतीकात्मक अर्थ है, परिस्थितियाँ जब बदलती हैं तो सत्ता के समीकरण भी बदल जाते हैं…!
आज के संदर्भ में संदेश:
इस लोकउक्ति को सामाजिक जीवन में इस प्रकार भी समझा जा सकता है…!
एक संकेत को संयोग समझा जा सकता है, लेकिन लगातार मिलते संकेतों को नजरअंदाज करना समझदारी नहीं…!
समाज में भी जब असंतोष, उपेक्षा, अन्याय, अव्यवस्था और नेतृत्व के प्रति अविश्वास लगातार बढ़ने लगे, तो केवल यह सोचकर निश्चिंत नहीं होना चाहिए कि “सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहेगा…!”
इतिहास बताता है कि परिवर्तन अक्सर अचानक दिखाई देता है, लेकिन उसकी भूमिका बहुत पहले तैयार हो चुकी होती है…!
इसीलिए इस कहावत का सार है:
“समय के संकेतों को पढ़ना सीखिए, क्योंकि जब परिवर्तन दस्तक देता है, तब सबसे पहले संकेत आते हैं और बाद में परिणाम दिखाई देता है…!”
यह राजस्थानी लोकज्ञान की ऐसी उक्ति है जिसमें प्रकृति के संकेत, लोकविश्वास और सत्ता-परिवर्तन का गहरा रूपक एक साथ दिखाई देता है…!






