“धन गियो फिर आ मिले,
त्रिया गयी मिल जाय।
भोम गई फिर सूं मिले,
गई पत कबहु न आय।।“
राजस्थानी लोकज्ञान की यह पंक्तियाँ केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन के उन कठोर सत्यों का आईना हैं जिन्हें मनुष्य अक्सर बहुत देर से समझता है, धन चला जाए तो मेहनत करके दोबारा कमाया जा सकता है, कोई अपना दूर हो जाए तो समय, प्रेम और प्रयास से संबंध फिर जुड़ सकते हैं, जमीन भी हाथ से निकल जाए तो परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर वापस प्राप्त की जा सकती है, लेकिन प्रतिष्ठा एक बार चली जाए तो उसे वापस पाना अत्यंत कठिन होता है…!
प्रतिष्ठा केवल नाम नहीं है, प्रतिष्ठा वर्षों के आचरण, व्यवहार, सत्यनिष्ठा, वचन और चरित्र से निर्मित होती है, इसे बनाने में पूरी जिंदगी लग सकती है, लेकिन इसे मिटाने के लिए कभी-कभी एक गलत निर्णय, एक झूठ, एक छल, एक अपमानजनक व्यवहार या एक सार्वजनिक अविश्वास ही पर्याप्त होता है…!
आज के सामाजिक जीवन में यह बात और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है, सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दे दिया है, लेकिन मंच मिलने का अर्थ यह नहीं कि शब्दों पर नियंत्रण समाप्त हो जाए, किसी के बारे में बिना प्रमाण लिख देना, आरोप लगाना, सार्वजनिक रूप से अपमान करना, निजी विवाद को समाज के सामने तमाशा बना देना या अपनी व्यक्तिगत खुन्नस को सामाजिक मुद्दे का रूप देना, ये सब क्षणिक संतोष दे सकते हैं, लेकिन व्यक्ति की अपनी प्रतिष्ठा पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा देते हैं…!
धन की कमी आदमी को गरीब बनाती है, लेकिन प्रतिष्ठा की कमी आदमी को विश्वासहीन बना देती है…!
समाज में व्यक्ति की वास्तविक पूँजी उसका बैंक-बैलेंस नहीं, बल्कि उसका विश्वास होता है, लोग आपके पास धन देखकर नहीं, आपके चरित्र पर विश्वास करके खड़े होते हैं, पद समाप्त हो सकता है, संपत्ति समाप्त हो सकती है, लोकप्रियता घट सकती है, लेकिन यदि चरित्र और प्रतिष्ठा जीवित है तो व्यक्ति फिर से खड़ा हो सकता है…!
इसके विपरीत, जिसके व्यवहार पर समाज का विश्वास उठ गया, उसके पास सब कुछ होते हुए भी उसका बहुत कुछ खो चुका होता है…!
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम यह समझें कि हर बात कह देना साहस नहीं होता और हर बात सह लेना कमजोरी नहीं होती, कई बार मौन व्यक्ति की प्रतिष्ठा को उस बहस से अधिक बचाता है, जिसमें जीतने के बाद भी सम्मान हार जाता है…!
विशेषकर सामाजिक संगठनों और समाज के सार्वजनिक जीवन में बैठे लोगों को यह बात समझनी चाहिए, पद प्रतिष्ठा नहीं देता, बल्कि प्रतिष्ठित आचरण पद को प्रतिष्ठा देता है, कुर्सी आज किसी के पास है, कल किसी और के पास होगी, लेकिन व्यक्ति के व्यवहार की स्मृति समाज में लंबे समय तक रहती है…!
इसलिए किसी को नीचा दिखाने से पहले, किसी पर आरोप लगाने से पहले, किसी का विश्वास तोड़ने से पहले और सार्वजनिक रूप से कोई शब्द लिखने से पहले एक बार स्वयं से पूछना चाहिए…?
“क्या यह बात मेरे व्यक्तित्व की ऊँचाई बढ़ाएगी या मेरी प्रतिष्ठा घटाएगी…?”
क्योंकि खोया हुआ धन फिर कमाया जा सकता है,
बिछड़ा हुआ संबंध फिर जोड़ा जा सकता है,
हाथ से निकली जमीन फिर खरीदी जा सकती है,
लेकिन खोया हुआ विश्वास और गई हुई प्रतिष्ठा बार-बार नहीं मिलती…!
यही इस लोक-उक्ति का सबसे बड़ा संदेश है:
जीवन में बहुत कुछ खोकर भी इंसान फिर खड़ा हो सकता है, लेकिन अपना चरित्र और प्रतिष्ठा मत खोइए, क्योंकि यही वह संपत्ति है जिसकी कोई कीमत नहीं और जिसका कोई विकल्प नहीं…!
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”






