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आने वाला समय कुंवारेपन का युग…?

SAMPADKIY: विवाह, परिवार और घटती जनसंख्या पर समय रहते गंभीर मंथन जरूरी…,

आज हम विकास, शिक्षा, करियर, आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों की बात करते हैं, यह सब आवश्यक भी है, लेकिन इसी विकास की दौड़ में यदि परिवार, विवाह, संतुलित दांपत्य जीवन और अगली पीढ़ी पीछे छूट जाए, तो हमें एक क्षण रुककर यह प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए, क्या हमारी प्रगति सामाजिक भविष्य की कीमत पर तो नहीं हो रही…?

हाल के वर्षों में विवाह की उम्र बढ़ने, विवाह के प्रति अनिच्छा, एकल जीवन की बढ़ती स्वीकार्यता, देर से मातृत्व-पितृत्व और छोटे परिवार की प्रवृत्ति पर दुनिया भर में चर्चा हो रही है, सोशल मीडिया पर प्रसारित कुछ रिपोर्टों और दावों में आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में महिलाओं के अविवाहित रहने की आशंका व्यक्त की गई है…!

हालांकि ऐसे आंकड़ों और उनके स्रोतों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन जिस सामाजिक परिवर्तन की ओर ये चर्चाएँ संकेत करती हैं, उसे नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है…!

विवाह को बाधा नहीं, जीवन का एक विकल्प समझें…,

आज की बेटी शिक्षित है, आत्मनिर्भर है और अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने में सक्षम है, यह समाज की उपलब्धि है, समस्या नहीं, समस्या तब पैदा होती है जब करियर और परिवार को एक-दूसरे का विरोधी मान लिया जाता है…!

विवाह किसी लड़की की स्वतंत्रता समाप्त करने का नाम नहीं है और न ही किसी लड़के के लिए केवल सामाजिक औपचारिकता, एक स्वस्थ विवाह दो स्वतंत्र व्यक्तियों की साझेदारी हो सकता है, जहाँ दोनों अपने सपनों, जिम्मेदारियों और परिवार के बीच संतुलन स्थापित करें…!

इसलिए विवाह की कोई एक कठोर “सही उम्र” सब पर लागू नहीं की जा सकती, शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक और सामाजिक परिपक्वता इन सभी को ध्यान में रखकर निर्णय होना चाहिए, केवल उम्र के दबाव में किया गया विवाह भी समाधान नहीं है…!

देर से विवाह सिर्फ व्यक्तिगत निर्णय नहीं, सामाजिक प्रभाव भी…,

विवाह लगातार टलता है तो उसके प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते, देर से विवाह के साथ कई बार संतानोत्पत्ति भी देर से होती है और परिवार का आकार छोटा होता जाता है, इसका सीधा संबंध भविष्य की जनसंख्या संरचना से है…!

आज अनेक मोहल्लों और गांवों में बच्चों की संख्या कम दिखाई देती है, संयुक्त परिवारों की जगह छोटे परिवार बढ़ रहे हैं, ताऊ, चाचा, बुआ, मामा और मौसी जैसे रिश्तों का दायरा भी सीमित होता जा रहा है…!

एक बच्चा केवल एक संतान नहीं होता, वह भविष्य के रिश्तों की संख्या भी निर्धारित करता है…!

यदि लगातार कई पीढ़ियों तक परिवारों में केवल एक संतान होती रही, तो आने वाली पीढ़ियों में भाई-बहन, चचेरे-ममेरे भाई-बहन और अन्य रक्त संबंध स्वाभाविक रूप से कम होते जाएंगे, इसका असर केवल जनसंख्या पर नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, भावनात्मक सहारे और पारिवारिक ताने-बाने पर भी पड़ सकता है…!

लेकिन समाधान डर नहीं संवाद है…,

यहाँ समाज को एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी…,

बेटियों को केवल “जल्दी विवाह” के लिए दबाव देना समाधान नहीं है, उसी तरह युवाओं को विवाह से विमुख करने वाली सामाजिक परिस्थितियों पर मौन रहना भी उचित नहीं…!

आज युवाओं के सामने शिक्षा, रोजगार, महंगाई, आवास, करियर, जीवनशैली और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अनेक प्रश्न हैं, विवाह और परिवार को लेकर उनकी चिंताओं को सुनना होगा…!

माता-पिता को भी यह समझना होगा कि रिश्ता ढूंढना पर्याप्त नहीं, योग्य जीवनसाथी, पारिवारिक संस्कार और बच्चों की सहमति का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है…!

एकल संतान की प्रवृत्ति पर भी विचार जरूरी…,

छोटा परिवार आर्थिक और व्यावहारिक दृष्टि से सुविधाजनक लग सकता है, लेकिन यदि यह प्रवृत्ति लगातार कई पीढ़ियों तक चलती है, तो इसके दीर्घकालीन सामाजिक परिणामों पर विचार होना चाहिए…!

बच्चे केवल परिवार की संख्या नहीं बढ़ाते वे रिश्तों का संसार बनाते हैं, भाई-बहन का रिश्ता, चचेरे-ममेरे भाई-बहन, बुआ-मौसी और चाचा-मामा जैसे रिश्ते भी उसी विस्तृत पारिवारिक संरचना से जन्म लेते हैं…!

इसलिए परिवार नियोजन व्यक्तिगत निर्णय है, लेकिन उसके सामाजिक प्रभाव पर चर्चा करना सामूहिक जिम्मेदारी भी है…!

समाज को बेटियों और बेटों दोनों के लिए समान दृष्टि रखनी होगी…,

यदि हम केवल लड़कियों को विवाह के लिए जिम्मेदार ठहराएंगे तो यह एकतरफा दृष्टिकोण होगा, लड़कों की बेरोजगारी, विवाह के प्रति उनकी अनिच्छा, नशे जैसी सामाजिक समस्याएँ, बढ़ती अपेक्षाएँ और बदलती जीवनशैली भी इस स्थिति के महत्वपूर्ण कारण हैं…!

विवाह के लिए समान रूप से लड़के और लड़की दोनों की तैयारी, जिम्मेदारी और सहमति आवश्यक है…!

समाज को यह भी देखना होगा कि विवाह के बाद महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और आत्मसम्मान से समझौता करने के लिए बाध्य न किया जाए, यदि विवाह को सम्मानजनक साझेदारी बनाया जाएगा, तो युवाओं के मन में परिवार के प्रति विश्वास भी मजबूत होगा…!

समाज या परिवार बचाना है तो परिवार को बेहतर बनाना होगा…,

केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “पहले लोग जल्दी विवाह करते थे, इसलिए सब ठीक था…!”

हमें यह भी देखना होगा कि आज के युवा विवाह से क्यों बच रहे हैं…?

क्या उन्हें सफल दांपत्य जीवन के उदाहरण दिखाई दे रहे हैं…?

क्या परिवारों में संवाद है…?

क्या विवाह के बाद दोनों पक्षों के सपनों का सम्मान होता है…?

क्या बेटियों को सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण मिलता है…?

क्या बेटों को जिम्मेदार पति और पिता बनने की शिक्षा दी जाती है…?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजे बिना केवल उम्र घटाने की अपील प्रभावी नहीं होगी…!

आने वाली पीढ़ी के नाम हमारी जिम्मेदारी…,

हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं, अच्छा करियर देना चाहते हैं, आर्थिक सुरक्षा देना चाहते हैं, लेकिन हमें यह भी सिखाना होगा कि जीवन केवल नौकरी, पद, पैसा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नाम नहीं है…!

जीवन में रिश्ते भी चाहिए,
सहारा भी चाहिए,
परिवार भी चाहिए,
और अगली पीढ़ी भी चाहिए…!

लेकिन परिवार ऐसा हो जिसमें प्रेम हो, सम्मान हो, समानता हो, संवाद हो और जिम्मेदारी हो…!

यही सच्ची सामाजिक प्रगति है…!

संपादकीय निष्कर्ष:

“आने वाला समय कुंवारेपन का युग होगा” यह वाक्य भय पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि चिंतन जगाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए…!

हमें न तो युवाओं को विवाह के लिए मजबूर करना है और न ही विवाह एवं परिवार को पुरानी व्यवस्था कहकर खारिज करना है…!

हमें बीच का संतुलित रास्ता खोजना है…!

शिक्षा भी चाहिए, संस्कार भी करियर भी चाहिए, परिवार भी, स्वतंत्रता भी चाहिए, जिम्मेदारी भी, व्यक्तिगत अधिकार भी चाहिए, सामाजिक उत्तरदायित्व भी…!

आज आवश्यकता किसी वर्ग, विशेषकर बेटियों को दोष देने की नहीं, बल्कि पूरे समाज को आत्ममंथन करने की है…!

घर-परिवार में बैठकर इस विषय पर बात कीजिए, युवाओं की सुनिए, माता-पिता अपनी अपेक्षाओं पर विचार करें और युवा भी अपने भविष्य के निर्णयों के दीर्घकालीन प्रभाव को समझें…!

क्योंकि…,

परिवार केवल चार दीवारों का नाम नहीं है, परिवार वह कड़ी है जो अतीत को वर्तमान से और वर्तमान को भविष्य से जोड़ती है, यदि वह कड़ी कमजोर हो रही है, तो समय रहते उसे मजबूत करना हम सभी की जिम्मेदारी है…!

सोचिए…,
चर्चा कीजिए…,
निर्णय थोपिए नहीं, समझाइए, क्योंकि समाज आदेशों से नहीं, समझ और संवाद से बचता है…!

संपादकीय,
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”

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