SAMPADKIY: विशेष संपादकीय | सिखवाल समाचार
विवाह हमारे सनातन संस्कारों में केवल दो व्यक्तियों के मिलन का उत्सव नहीं, बल्कि दो परिवारों, परंपराओं और संस्कारों के जुड़ने का मंगल अवसर है, इसलिए विवाह की प्रत्येक रस्म और उससे जुड़ी सामग्री का अपना सांस्कृतिक महत्व रहा है, इन्हीं में एक महत्वपूर्ण परंपरा है: तोरण या वंदनवार…!
आज विवाह समारोहों में बाजार से मिलने वाले आकर्षक, चमकीले और प्लास्टिक से बने अनेक प्रकार के तोरण देखने को मिलते हैं, सवाल यह है कि क्या हर सुंदर दिखने वाला तोरण परंपरागत दृष्टि से भी उचित है…?
आखिर विवाह में तोरण कैसा होना चाहिए…?
हमारी पारंपरिक मान्यताओं में आम के हरे पत्तों, पुष्पों और प्राकृतिक सामग्री से बनी वंदनवार को शुभ कार्यों से जोड़ा गया है, विवाह-मंडप में भी आम के पत्तों के प्रयोग की परंपरा मिलती है…!
इसलिए विवाह के मुख्य द्वार अथवा मंडप पर लगाया जाने वाला तोरण सादा, सात्त्विक, स्वच्छ और मांगलिक प्रतीकों से युक्त होना अधिक उपयुक्त माना जा सकता है।
आम के पत्तों के साथ गेंदे के फूल, अशोक के पत्ते अथवा अन्य स्थानीय पुष्प-पत्तियों से बनी वंदनवार भी सुंदर और परंपरानुकूल विकल्प हो सकती है…!
बाजार में बिकने वाले तोरणों का क्या…?
यह कहना उचित नहीं होगा कि बाजार में बिकने वाला प्रत्येक कृत्रिम तोरण गलत है, आज की परिस्थितियों में कृत्रिम सामग्री से बने तोरण भी सजावट के लिए उपयोग किए जाते हैं…!
लेकिन सजावट और संस्कार में अंतर समझना आवश्यक है…!
यदि कोई प्लास्टिक या सिंथेटिक तोरण केवल सजावटी हिस्से के रूप में लगाया गया है, तो उसे परंपरागत वंदनवार का विकल्प मानना अलग बात है, किंतु यदि विवाह की पारंपरिक मांगलिक रस्मों में प्राकृतिक पत्तों और पुष्पों का स्थान पूरी तरह चमकीले प्लास्टिक, अशोभनीय आकृतियों या केवल फैशन आधारित सजावट ने ले लिया है, तो हमें एक बार अवश्य सोचना चाहिए कि कहीं हम परंपरा का अर्थ खोकर केवल उसका बाहरी प्रदर्शन तो नहीं कर रहे…?
तोरण में किन बातों का ध्यान रखें…?
- ताजे और स्वच्छ पत्ते: यदि प्राकृतिक तोरण लगाया जाए तो हरे, साफ और स्वस्थ पत्तों का उपयोग करें, सूखे, टूटे या खराब पत्तों से बचना उचित है…!
- मांगलिक स्वरूप: तोरण में आम के पत्ते, गेंदे के फूल, कलावा, पारंपरिक पुष्प सज्जा तथा परिवार की स्थानीय परंपरा के अनुरूप शुभ प्रतीकों का प्रयोग किया जा सकता है…!
- दिखावे से अधिक संस्कार: तोरण जितना महंगा या चमकीला हो, उतना ही शुभ हो, ऐसा कोई सिद्धांत नहीं, विवाह की गरिमा सादगी, शुचिता और संस्कार से बढ़ती है…!
- स्थानीय परंपरा को महत्व दें: राजस्थानी, मारवाड़ी, सिखवाल अथवा अन्य समुदायों में विवाह की अपनी विशिष्ट लोकपरंपराएँ रही हैं, आधुनिक सजावट के नाम पर उन्हें पूरी तरह विस्मृत करना उचित नहीं…!
एक महत्वपूर्ण बात:
आज हम विवाह में लाखों रुपये सजावट पर खर्च कर देते हैं, लेकिन यह जानने की कोशिश कम करते हैं कि जिस वस्तु को हम ‘शुभ’ कहकर लगा रहे हैं, उसका हमारी परंपरा में स्थान क्या है…?
हमें आधुनिकता का विरोध नहीं करना चाहिए, लेकिन आधुनिकता के नाम पर परंपरा का विस्थापन भी नहीं होना चाहिए, विवाह में फूलों की खुशबू हो, आम के पत्तों की हरियाली हो, मांगलिक प्रतीकों की गरिमा हो और अपनी संस्कृति की पहचान दिखाई दे, तो सजावट भी संस्कार का हिस्सा बन जाती है…!
तोरण सुंदर अवश्य हो, लेकिन केवल आंखों को नहीं हमारी संस्कृति को भी अच्छा लगे…!
यही सदियों से विवाहोत्सव की पारंपरिक वास्तविक शोभा है…!
संपादकीय:
सुरेश कुमार व्यास “जानम”✍️
सिखवाल समाचार®
“सत्य का दर्पण-समाज को अर्पण”






