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रिश्ते बचाइए…,

रिश्ते बचाइए, रिश्तों में जीतने की कोशिश मत कीजिए…,

SAMPADKIY-संपादकीय | सिखवाल समाचार®

अंजान अपना बन जाए तो शायद कोई बड़ी परेशानी नहीं होती, लेकिन जब कोई अपना ही अंजान बन जाए, तब मन के भीतर उठने वाली पीड़ा को शब्दों में बयां करना कठिन हो जाता है, रिश्ते केवल खून के संबंधों से नहीं बनते, वे विश्वास, अपनापन, सम्मान, संवेदनशीलता और संवाद से जीवित रहते हैं…!

आज अधिकतर समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि रिश्तों में दूरी अक्सर किसी बड़े विवाद से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी गलतफहमियों से पैदा होती है, जब दिल में वहम, दिमाग में ज़िद और बातों में मुकाबला आ जाए, तो रिश्तों की हार लगभग निश्चित हो जाती है, व्यक्ति सामने वाले को समझने के बजाय उसे हराने की कोशिश करने लगता है, फिर संवाद की जगह तर्क, प्रेम की जगह अहंकार और अपनत्व के स्थान पर अभद्रता तथा हिसाब-किताब जगह लेने लगता है…!

रिश्तों में सबसे खतरनाक चीज हमेशा कोई तीसरा व्यक्ति नहीं होता, कई बार हमारा अपना अहंकार, हमारी जिद और हमारी गलत धारणा ही रिश्ते की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है, एक छोटी-सी बात पर हम मन में कहानी बना लेते हैं, सामने वाले से पूछने के बजाय निष्कर्ष निकाल लेते हैं और फिर उसी निष्कर्ष को सच मानकर संबंधों से दूरी बनाने लगते हैं…!

हमें यह समझना होगा कि हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं, हर बहस जीतना जरूरी नहीं और हर गलती का हिसाब रखना भी जरूरी नहीं, कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें तर्क से नहीं, थोड़ी समझदारी, थोड़ा धैर्य और बहुत सारे अपनत्व से बचाया जाता है, क्यूँकि कोई अपना अज्ञानतावश गालीयाँ देता है और आप भी उसी का अनुसरण करते है तो उसमें और आप में अंतर ही क्या हैं, रिश्तों में इतना संयम तो अवश्य रखना चाहिए कि कभी किसी मोड़ पर आमना-सामना हो जाये तो शर्मिंदगी महसूस न हो…!

परिवार हो, मित्रता हो या सामाजिक संबंध, हर रिश्ते में कभी न कभी मतभेद होंगे, लेकिन मतभेद को मनभेद बनने से रोकना ही रिश्तों की असली समझदारी है, सामने वाला गलत है तो उसे अपमानित करने के बजाय समझाने का प्रयास कीजिए, स्वयं गलत हों तो माफी मांगने में संकोच मत कीजिए, क्योंकि माफी मांगने वाला छोटा नहीं होता, बल्कि वह रिश्ते को अपने अहंकार से बड़ा मानता है…!

इस संसार में देखने के लिए बहुत से खूबसूरत स्थान हैं, लेकिन शायद सबसे खूबसूरत जगह वह है जहाँ हम बंद आँखों से अपने भीतर झाँकते हैं, जब हम स्वयं से पूछते हैं, क्या मेरी जिद सही थी…?
क्या मेरा व्यवहार उचित था…?
क्या मैंने किसी अपने को अनावश्यक रूप से दु:ख पहुँचाया हैं…?
तभी रिश्तों को बचाने की वास्तविक शुरुआत होती है…!

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सोशल मीडिया पर हजारों लोगों से जुड़े रहने से ज्यादा अपने घर के कुछ लोगों से दिल से जुड़े रहें, मोबाइल की स्क्रीन पर रिश्तों की तस्वीरें लगाने से ज्यादा जरूरी है कि वास्तविक जीवन में रिश्तों में गर्माहट बनी रहे…!

त्योहारों पर शुभकामनाएँ भेजने से पहले घर के उस व्यक्ति से बात कर लीजिए, जिससे किसी छोटी-सी बात पर महीनों से बातचीत बंद है…!

याद रखिए: समय बीत जाने के बाद धन वापस कमाया जा सकता है, प्रतिष्ठा फिर बनाई जा सकती है, लेकिन किसी अपने के मन में पैदा हुई गहरी दूरी को मिटाना हमेशा आसान नहीं होता…!

इसलिए रिश्तों को जीतने की नहीं, निभाने की कोशिश कीजिए…!
अपनों को समझने का प्रयास कीजिए, हर बात में दोष मत खोजिए…!
वहम की जगह विश्वास रखिए, जिद की जगह समझदारी रखिए और मुकाबले की जगह संवाद रखिए…!

क्योंकि अंततः जीवन में यह मायने नहीं रखता कि बहस में कौन जीता था, मायने यह रखता है कि उस जीत की कीमत पर हमने अपना कौन खो दिया…!

रिश्ते बहुत अनमोल हैं…,
इन्हें अहंकार की कीमत पर मत हारिए…!

सुरेश कुमार व्यास “जानम”
संपादकीय | सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”

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