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धन से नहीं, संस्कारों से अमीर होता है इंसान…,

SAMPADKIY/सम्पादकीय : धन से नहीं, संस्कारों से अमीर होता है इंसान…,

“इंसान पैसों से नहीं, संस्कारों से अमीर होता है, संस्कारों और विचारों से पता चल जाता है कि इंसान की परवरिश किस वातावरण और किन लोगों के सानिध्य में हुई है…!”

आज समाज में धन, पद, प्रतिष्ठा और आधुनिकता को सफलता का पैमाना मान लिया गया है, बड़े मकान, महंगी गाड़ियाँ और बैंक-बैलेंस देखकर हम किसी व्यक्ति को सफल और संपन्न मान लेते हैं, लेकिन वास्तविक संपन्नता इन चीजों में नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, विचार और संस्कारों में दिखाई देती है…!

सबसे बड़ा दुर्भाग्य तब सामने आता है, जब कोई व्यक्ति अपने ही परिवार के प्रति विरोध, अपमान और अवज्ञा को अपनी स्वतंत्रता समझने लगता है…!

हमारे माता-पिता हर बात में सही हों, यह आवश्यक नहीं, क्यूँकि पीढ़ियों के बीच विचारों का अंतर होना स्वाभाविक है, हमारी अपनी बात रखना भी गलत नहीं है, लेकिन असहमति और अपमान में बहुत बड़ा अंतर होता है, विचार अलग हो सकते हैं, रास्ते अलग हो सकते हैं, पर हमारी भाषा, व्यवहार और सम्मान की मर्यादा नहीं टूटनी चाहिए…!

आज कुछ लोग अपने परिवार को ही अपने जीवन की सबसे बड़ी बाधा मानने लगे हैं, उनकी सलाह अपने सुविधा अनुसार अच्छी और बुरी लगती है, बात हमारे पक्ष में है तो उनका अनुभव अनुकरणीय लगता हैं, किन्तु हमारी सुविधानुसार न हो तो पुराना लगता है और उनका त्याग दिखाई नहीं देता, लेकिन वही व्यक्ति बाहर के लोगों की दो मीठी बातों पर अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हो जाता है…!

याद रखिए:
जिस घर में बड़े-बुजर्गों का सम्मान नहीं होता, वहाँ धन की चमक भी रिश्तों का अंधेरा दूर नहीं कर सकती…!

परिवार के सदस्यों से मतभेद हो सकता है, संवाद होना चाहिए, शिकायत हो सकती है, समाधान होना चाहिए, नाराजगी हो सकती है, लेकिन नफरत नहीं, क्योंकि जिस दिन हम परिवार के सदस्यों से ऐसा व्यवहार करने लगेंगे, उन्हें बोझ समझने लगेंगे, उस दिन वह अपनी जड़ों से ही दूर होने लगेंगे…!

संस्कार का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपनी स्वतंत्र सोच छोड़ दे, संस्कार का अर्थ है स्वतंत्र होकर भी मर्यादा में रहना, असहमति में भी सम्मान बनाए रखना और सफलता मिलने के बाद अपनी जड़ों को न भूलना…!

समाज को भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना होगा, केवल बेटे-बेटियों को दोष देने से समस्या हल नहीं होगी, माता-पिता को भी बच्चों के साथ संवाद, विश्वास और बदलते समय की समझ बनाए रखनी होगी, परिवार तभी मजबूत होगा जब दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे को सुनेंगी और समझेंगी…!

अंततः इतना ही:

बुजुर्गों के चरणों में केवल उम्र का अनुभव नहीं, हमारी अपनी कहानी छिपी होती है, उनका सम्मान करना कोई एहसान नहीं, हमारे संस्कारों की पहचान है…!

धन विरासत में मिल सकता है, पद छीना या पाया जा सकता है, प्रतिष्ठा समय के साथ बदल सकती है, लेकिन संस्कार व्यक्ति के चरित्र की वह पहचान हैं, जो उसके जाने के बाद भी लोगों की स्मृति में जीवित रहती है…!

इसलिए अपने बच्चों को केवल संपत्ति मत दीजिए, संस्कार दीजिए, और अपनी सफलता का प्रमाण बैंक-बैलेंस से नहीं, इस बात से दीजिए कि आपके कारण आपके बुजुर्गों की आँखों में गर्व और सम्मान है या नहीं…!

क्योंकि असली अमीरी वही है, जहाँ घर में धन कम हो तो भी संस्कारों की कमी न हो…!

संपादकीय:
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”

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