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हम ही है समाज…,

हम ही है समाज जैसा अड़ियल स्वभाव, गिरता मानसिक स्वास्थ्य और समझदारी का सामाजिक भ्रम…,

SAMPADKIY/संपादकीय:
“समय, सत्ता, संपत्ति और शरीर चाहे साथ दें या न दें, लेकिन स्वभाव, स्वास्थ्य, समझदारी और सच्चे संबंध हमेशा साथ देते हैं…!”

समाज में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें अपनी गलती से ज्यादा अपनी बात सही साबित करने की चिंता रहती है, उन्हें समझाना हो तो पहले उनकी “महान समझदारी” की प्रशंसा करनी पड़ती है, क्योंकि वे मानते हैं कि समाज में उनसे अधिक समझदार, अनुभवी और जिम्मेदार व्यक्ति शायद पैदा ही नहीं हुआ…!

विडंबना यह है कि ऐसे लोग सामाजिक मंच पर स्वयं को समाजसेवी तो घोषित कर देते हैं, लेकिन अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों से बचने को भी समाजसेवा का ही एक अंग समझ लेते हैं…!

अड़ियल स्वभाव: जहाँ “मैं” ही संविधान है…,

अड़ियल व्यक्ति के लिए तर्क का अर्थ है, जो मेरी बात माने, वही समझदार, जो प्रश्न पूछे, वह विरोधी, जो आईना दिखाए, वह समाज का दुश्मन और जो चुपचाप समर्थन करे, वही सच्चा समाजसेवी…!

ऐसे स्वभाव का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि व्यक्ति धीरे-धीरे दूसरों से नहीं, स्वयं से भी संवाद करना बंद कर देता है, हर असहमति उसे अपमान लगती है और हर सलाह उसके अहंकार पर हमला…!

फिर मानसिक तनाव बढ़ता है, रिश्ते कमजोर होते हैं, मित्र दूर होते हैं और व्यक्ति अकेला पड़ता जाता है, लेकिन दोष फिर भी दूसरों का ही निकलता है…!

समाजसेवा या सामाजिक मंच पर स्वयं की ब्रांडिंग…?

आज सामाजिक मंचों पर एक विचित्र प्रवृत्ति दिखाई देती है, किसी कार्यक्रम में दो मिनट बैठ जाइए, किसी फोटो में खड़े हो जाइए, किसी के सम्मान में माला पहन लीजिए और अगले दिन सोशल मीडिया पर ऐसी प्रस्तुति होती है मानो समाज के विकास की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर हो…!

समाजसेवा का वास्तविक अर्थ है समय देना, जिम्मेदारी निभाना, पारदर्शिता रखना, गलती होने पर स्वीकार करना और समाजहित में व्यक्तिगत अहंकार को पीछे रखना…!

लेकिन कुछ स्वयंभू समाजसेवियों के लिए समाजसेवा का अर्थ हो गया है:

“जहाँ फोटो मिले, वहाँ पहुँचो, जहाँ निर्णय हो, वहाँ अधिकार माँगो, जहाँ हिसाब पूछा जाए, वहाँ प्रश्न पूछने वाले को ही कटघरे में खड़ा कर दो…!”

और यदि कोई कह दे कि “भाई साहब, आपकी जिम्मेदारी भी तो बनती है” तो तत्काल उत्तर आता है, “आप जानते नहीं, हमने समाज के लिए कितना किया है…!”

सवाल यह है कि समाज ने जो किया उसका हिसाब कौन देगा…?
और जो नहीं किया, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा…?

समझदारी का सबसे बड़ा प्रमाण गलती स्वीकार करना…,

वास्तविक समझदार व्यक्ति वह नहीं जो हर बहस जीत जाए, या आपके द्वारा सामाजिक मंच पर रखे गये किसी भी विषय को व्यक्तिगत निजता पर हमला समझें, वास्तविक समझदार वह है जो समय रहते समझ जाए कि हर बहस जीतना जरूरी नहीं, लेकिन हर रिश्ते को हार जाना भी समझदारी नहीं…!

समाज में विचार अलग हो सकते हैं, दृष्टिकोण अलग हो सकते हैं, निर्णयों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यदि हर मतभेद व्यक्तिगत दुश्मनी बन जाए तो समाज नहीं, केवल गुट बनते हैं…!

और गुटों में समाजसेवा नहीं होती सिर्फ शक्ति प्रदर्शन होता है…!

स्वास्थ्य केवल शरीर का नहीं होता…,

हम अक्सर शारीरिक स्वास्थ्य की चिंता करते हैं, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा कर देते हैं…!

हर समय क्रोध में रहना, हर बात को अपने विरुद्ध समझना, लगातार विवादों में उलझना, दूसरों की नीयत पर शक करना, अपनी गलती स्वीकार न करना और रिश्तों में तनाव पैदा करते रहना, यह किसी उपलब्धि का प्रमाण नहीं है…!

यह संकेत है कि व्यक्ति को स्वयं से भी थोड़ा संवाद करने की आवश्यकता है…!

क्योंकि मन की शांति पद से बड़ी है, प्रतिष्ठा से बड़ी है और किसी भी सामाजिक पहचान से बड़ी है…!

अंततः समाज आईना है:

समाज को अपनी जागीर समझने वालों को यह याद रखना चाहिए कि समय किसी का स्थायी नहीं होता…!

आज आपके पास पद है, कल किसी और के पास होगा, आज लोग आपकी जय-जयकार कर रहे हैं, कल वही लोग आपकी कार्यशैली पर सवाल भी कर सकते हैं, आज संपत्ति है, कल परिस्थिति बदल सकती है, आज शरीर स्वस्थ है, कल उम्र अपना हिसाब माँग सकती है…!

लेकिन यदि स्वभाव अच्छा है, सोच संतुलित है, स्वास्थ्य ठीक है, समझदारी जीवित है और रिश्ते सच्चे हैं, तो व्यक्ति कठिन समय में भी अकेला नहीं पड़ता…!

इसलिए समाजसेवी बनने से पहले जिम्मेदार इंसान बनिए, समाज को सुधारने से पहले अपने स्वभाव को सुधारिए,
दूसरों को आईना दिखाने से पहले स्वयं को आईने में देखिए…!

क्योंकि समाज में सबसे बड़ा पद “समझदार व्यक्ति” होने का है और इस पद का कोई चुनाव नहीं होता, कोई नियुक्ति-पत्र नहीं मिलता,
कोई माला नहीं पहनाई जाती, यह पद केवल आपके व्यवहार से समाज स्वयं आपको देता है…!

संपादकीय:
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”

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