“खैती… पाती… विनती… ओर घोड़े की तंग…,
अपने हाथ सँवारिये, चाहे लाख लोग हो संग…!!”
अर्थात जीवन में कुछ काम ऐसे होते हैं, जिनकी जिम्मेदारी अंततः अपने ही हाथों में होती है…!
खेती हो, घर-परिवार का संचालन हो, किसी से विनती करनी हो या घोड़े की लगाम संभालनी हो, इन मामलों में केवल दूसरों के भरोसे बैठकर काम नहीं चलता…!
आज के समय में हम अक्सर अपनी जिम्मेदारियों का बोझ दूसरों के कंधों पर डालने के आदी होते जा रहे हैं, काम अपना होता है, लेकिन उम्मीद दूसरों से, गलती अपनी होती है, लेकिन दोष दूसरों का, सफलता मिले तो श्रेय लेने वालों की भीड़ और असफलता आए तो जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं…!
यही सोच व्यक्ति को कमजोर बनाती है…!
समाज में भी यही दिखाई देता है, हम चाहते हैं कि कोई दूसरा समाज को सुधारे, कोई दूसरा युवाओं को दिशा दे, कोई दूसरा जरूरतमंद की मदद करे, कोई दूसरा रिश्ते बचाए और कोई दूसरा समाज की बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाए…!
लेकिन याद रखिए:
समाज किसी दूसरे से नहीं, “मैं” से बदलता है…!
अगर हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाने लगे, तो समाज को सुधारने के लिए बड़े-बड़े भाषणों की जरूरत नहीं पड़ेगी…!
घोड़े की तंग अपने हाथ में हो तो दिशा भी अपने हाथ में रहती है, दूसरे के हाथ में लगाम देकर फिर यह शिकायत करना कि घोड़ा गलत दिशा में चला गया, यह समझदारी नहीं, अपनी जिम्मेदारी से पलायन है…!
इसी तरह जीवन की “लगाम” भी दूसरों को मत सौंपिए, आपके निर्णय, आपके संस्कार, आपकी मेहनत, आपका व्यवहार और आपके रिश्ते इनकी जिम्मेदारी सबसे पहले आपकी है…!
लोग लाख साथ खड़े हों, लेकिन मुश्किल समय में अपने निर्णय स्वयं लेने पड़ते हैं, भीड़ हौसला दे सकती है, रास्ता दिखा सकती है, सलाह दे सकती है, मगर चलना आपको ही पड़ता है…!
इसलिए:
दूसरों के सहारे सपने मत पालिए, अपने हाथों पर भरोसा कीजिए, सलाह सबकी सुनिए,
लेकिन निर्णय सोच-समझकर स्वयं लीजिए, साथ सबका रखिए, लेकिन अपनी जिम्मेदारी किसी और को मत सौंपिए…!
क्योंकि जिंदगी में भीड़ हमेशा साथ नहीं रहती, लेकिन आपका कर्म, आपका चरित्र और आपकी जिम्मेदारी हमेशा आपके साथ रहती है…!
सामाजिक जागरण का संदेश:
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “कोई करेगा” की मानसिकता छोड़कर “मैं करूँगा” की सोच अपनाएँ…!
समाज में गंदगी है तो शुरुआत अपने घर से करें, रिश्तों में कड़वाहट है, तो पहल स्वयं करें, युवाओं में भटकाव है, तो अपने बच्चों को समय दें, समाज में स्वार्थ बढ़ रहा है, तो स्वयं निस्वार्थ सेवा करें…!
झूठ और दिखावे का बोलबाला है, तो अपने आचरण से सत्य की मिसाल बनें…!
क्योंकि समाज भाषणों से नहीं, उदाहरणों से बदलता है…!
और अंत में यही लोककहावत हमें याद दिलाती है:
“खैती… पाती… विनती… ओर घोड़े की तंग…,
अपने हाथ सँवारिये,
चाहे लाख लोग हो संग…!”
🙏 अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाइए, अपने कर्म की लगाम अपने हाथ रखिए और समाज परिवर्तन की शुरुआत दूसरों से नहीं खुद से कीजिए…!🙏






