spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

Top 5 This Week

spot_imgspot_imgspot_img

Related Posts

सिखवाल समाज में तीन सामूहिक विवाह सम्मेलन…,

सामाजिक कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार में भेदभाव क्यों…?

सिखवाल समाज में इंदौर-नीमच-भीलवाड़ा में सामूहिक विवाह के भव्य आयोजन होने जा रहे हैं, किन्तु प्रचार-प्रसार में भेदभावपूर्ण व्यवहार क्यूँ…?

यदि आयोजन समाज के हैं, तो सामाजिक एकता अखण्डता के लिए प्रचार भी सभी आयोजनों का होना चाहिए…!

सिखवाल समाज के लिए आने वाले छह महीने उत्साह और सामाजिक एकजुटता के लिहाज से देखा जाय तो अत्यंत ही महत्वपूर्ण हैं, नवंबर में इंदौर, फरवरी के दूसरे सप्ताह में नीमच और फरवरी के ही तीसरे सप्ताह में भीलवाड़ा जैसे तीनों शहरों में सामूहिक विवाह सम्मेलनों का आयोजन होने जा रहा है, तीनों आयोजन निश्चित रूप से समाजहित की दिशा में सराहनीय प्रयास हैं, उम्मीद की जाती हैं कि यँहा भारी संख्या में सिखवाल समाज के घर बसेंगे, जो सबसे बड़ा पुण्य का कार्य हैं…!

सवाल इन आयोजन कर्ताओं कि नीयत पर नहीं, कुछ लोगों द्वारा अपनाई जा रही प्रचार-प्रसार की नीति और व्यवहार पर है…?

यदि तीनों कार्यक्रम का उद्धेश्य सामाजिक सेवा हैं,
यदि तीनों आयोजन समाज बँधुओं के हित के लिए हैं,
यदि तीनों आयोजन कर्ताओं का उद्देश्य समाज को जोड़ना है,
तो फिर इन कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार में भेदभाव की गुंजाइश कहाँ से आ गई…?

क्या प्रचार-प्रसार करने वालों का मूल आधार सामाजिक सेवा है या स्वयँ की सुविधा अनुसार सेवा…?

आज आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे लोग स्वयं से यह सवाल अवश्य पूछें…?

क्या सामाजिक सेवा के नाम पर प्रचार-प्रसार का अर्थ सभी आयोजन को आगे बढ़ाना है या केवल किसी कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार करना और अन्य आयोजन के प्रचार-प्रसार में द्वेषपूर्ण भावना से रुकावट पैदा करना हैं…?

क्या किसी एक आयोजन के प्रचार को प्राथमिकता देकर दूसरे सामाजिक आयोजनों की अनदेखी करना उचित है…?

क्या समाज की सामाजिक एकता का मंच किसी कि संकीर्ण मानसिकता के रूप से इतना छोटा हो गया है कि उसमें तीन सामाजिक आयोजनों के लिए एक समान स्थान भी नहीं बचा…?

समाज सेवा का अर्थ सुविधा अनुसार चयन नहीं, समाज के प्रति एकसमान समर्पण की भावना है…!

समाज का अर्थ सिर्फ अपना-पराया नहीं, हम सभी का हमारा अपना है…!

यदि इंदौर का सम्मेलन समाज का है, तो उसका प्रचार होना चाहिए…,
यदि नीमच का सम्मेलन समाज का है, तो उसका भी प्रचार होना चाहिए…,
यदि भीलवाड़ा का सम्मेलन समाज का है, तो उसके प्रचार-प्रसार के लिए भी वही सम्मान और सहयोग होना चाहिए, जो पहले दोनों सम्मेलनों का हो रहा हैं…!

भेदभाव करने से समाज जुड़ता नही, बल्कि समाज में दूरीयाँ बढ़ती है, जो समाज को बाँटने की श्रेणी में माना जाना चाहिए…!

सामूहिक विवाह का मूल भाव ही है, सामूहिकता, सहयोग, समानता और सामाजिक एकता…!

ऐसे आयोजनों के प्रचार में यदि पसंद-नापसंद, व्यक्तिगत संबंध, गुटबाजी अथवा क्षेत्रीय सोच हावी हो जाए, तो फिर हमें यह भी सोचना होगा कि हम किसी एक सामूहिक विवाह जैसे आयोजन का प्रचार-प्रसार तो कर रहे हैं, लेकिन क्या हम खुद में थोड़ी सी सामूहिक भावना भी बचा पा रहे हैं…?

सामाजिक सेवा किसी व्यक्ति, संस्था या क्षेत्र की जागीर नहीं हो सकती, आज यदि किसी एक आयोजन को प्रचार-प्रसार का मंच मिला और दूसरे को नजरअंदाज किया गया, तो कल यही सवाल हर आयोजनकर्ताओं के सामने खड़ा होगा “हमारे साथ ऐसा क्यों…?”

समाज को ऐसे कार्यकमों के लिए केवल प्रचार-प्रसार की आवश्यक्ता ही नही हैं, बल्कि प्रचार करने वालों की नियति में भी एक समान पारदर्शिता नजर आनी चाहिए…!

जरूरत इस बात की है कि समाज में प्रचार-प्रसार के लिए भी एक स्पष्ट और समान नीति बने…!

जो भी आयोजन समाजहित में है, उसका प्रचार एक समान और पूरे मान-सम्मान के साथ हो…!

किसी एक आयोजन का प्रचार करना और किसी दूसरे आयोजन के प्रचार में अवरोध पैदा करना, सामाजिक सेवा नही हैं, बल्कि तीनों आयोजनों की जानकारी सामाजिक मंच से समाज के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना ही वास्तविक सामाजिक सेवा और सामाजिक सहयोग है…!

इंदौर हो या नीमच,
नीमच हो या भीलवाड़ा,
मंच भले ही अलग-अलग हो सकते हैं,
मगर हमारा सिखवाल समाज तो एक ही है…!

इसलिए सवाल किसी एक व्यक्ति से नहीं, हमारी सभी की सामूहिक सोच से है…?

आखिर यह कैसी सामाजिक सेवा…?

अगर सेवा में भी चयन है,
सहयोग में भी पक्षपात है,
प्रचार में भी भेदभाव है,
और समाजहित में भी अपना-पराया है, तो फिर हमें रुककर यह तय करना होगा कि हम वास्तव में समाज सेवा कर रहे हैं या अपनी पसंद की सेवा…?

समाज को जोड़ने वाले आयोजनों को जोड़कर प्रचारित करना ही सच्ची सामाजिक सेवा है…!

आइए, व्यक्ति नहीं, व्यवस्था पर सवाल करें…?
आयोजन नहीं, आयोजनों के प्रति अपने व्यवहार पर विचार करें…?

क्योंकि:
“सामूहिक विवाह तभी सार्थक है,
जब उसके पीछे की सामाजिक भावना भी सामूहिक हो…!”

सिखवाल समाज को किसी एक आयोजन का नहीं, हर समाजहितकारी आयोजन का साथ चाहिए…!

सवाल तीखा है, लेकिन उद्देश्य समाज को तोड़ना नहीं, भेदभाव की दीवारें हटाकर समाज को और मजबूत करना है…!

मर्जी आपकी हैं, समाज हम सभी का हैं…!👏

सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles