आज समाज में पहचान बनाने की होड़ है, किसके पास कितना पद है, किसके साथ कितनी तस्वीर है, किसकी कितनी वाहवाही है और किसका नाम कितनी बार लिया जा रहा है, लेकिन इसी दौड़ में हम एक महत्वपूर्ण प्रश्न भूलते जा रहे हैं, हम व्यक्ति के रूप में पहचाने जा रहे हैं या अपने व्यक्तित्व के कारण…?
व्यक्ति होना जन्म से मिलता है, लेकिन व्यक्तित्व अपने कर्मों से बनाया जाता है…!
पद चाटूकारिता चमचागिरी से मिल सकता है, प्रतिष्ठा खरीदी जा सकती है, तस्वीरें खिंचवाई जा सकती हैं और मंच पर ज़बरदस्ती का सम्मान भी प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन चरित्र, संस्कार, ईमानदारी, संवेदनशीलता और समाज के प्रति निष्ठा का निर्माण किसी समारोह में नहीं होता, इसके लिए जीवन भर कर्म करना पड़ता है…!
आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि समाज में कितने लोग बड़े पदों पर बैठे हैं, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि उन पदों पर बैठे लोगों का व्यक्तित्व कितना बड़ा है…?
क्योंकि पद समाप्त हो जाता है, सत्ता बदल जाती है, तस्वीरें पुरानी पड़ जाती हैं और तालियाँ थम जाती हैं, मगर किसी व्यक्ति का अच्छा व्यवहार, उसकी सेवा, उसकी सत्यनिष्ठा और उसके द्वारा किए गए समाजहित के कार्य पीढ़ियों तक याद रहते हैं…!
विडंबना यह है कि हम अक्सर व्यक्ति की ऊँचाई उसके पद से और उसकी महानता उसके प्रभाव से मापने लगते हैं, जबकि समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जिनके सामने पद छोटा और व्यक्तित्व बड़ा हो…!
समाज में वास्तविक सम्मान मांगने से नहीं मिलता, कमाना पड़ता है, और सम्मान उस व्यक्ति को मिलता है जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के लिए सोचता है…!
इसलिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से एक सवाल पूछना चाहिए…?
“मेरे जाने के बाद मेरे बारे में क्या याद रखा जाएगा, मेरा पद, मेरा पैसा और मेरी तस्वीरें या मेरे संस्कार, मेरे कर्म और मेरा व्यक्तित्व…?”
यदि उत्तर दूसरा है, तो समझिए जीवन सार्थक दिशा में है…!
आइए, हम समाज में व्यक्तियों की भीड़ नहीं, व्यक्तित्वों की पीढ़ी तैयार करें, ऐसी पीढ़ी, जो पद के पीछे नहीं भागे बल्कि अपने कर्मों से पद की गरिमा बढ़ाए, जो सम्मान पाने से पहले सम्मान देना सीखे, जो समाज की तस्वीर में दिखाई देने से अधिक समाज के भविष्य को संवारने में विश्वास रखे…!
क्योंकि इतिहास यह नहीं पूछता कि कौन कितने वर्षों तक पद पर रहा, इतिहास यह याद रखता है कि उसने अपने समय में क्या किया…?
संपादकीय निष्कर्ष:
व्यक्ति का जीवन सीमित है, पर व्यक्तित्व की छाप असीमित हो सकती है, इसलिए अपने नाम के आगे पद जोड़ने से पहले अपने जीवन में संस्कार जोड़िए, तस्वीरों में दिखाई देने से पहले अपने कर्मों में दिखाई दीजिए, और समाज में पहचान बनाने से पहले ऐसा व्यक्तित्व बनाइए, जिसकी पहचान आपके पीछे चलने वाले लोग भी गर्व से करें…!
व्यक्ति समाप्त हो जाता है,
लेकिन सच्चा व्यक्तित्व सदैव जीवित रहता है…!
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”






