SAMPADKIY: पानी अपनी शीतलता के कारण स्वयं को शांत समझ सकता है, लेकिन जब तक उसके सामने अग्नि का संयोग नहीं आता, तब तक उसकी वास्तविक क्षमता की परीक्षा नहीं होती, अग्नि का ताप ही बता देता है कि उसकी शीतलता कितनी स्थायी है…!
मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है…!
जब परिस्थितियाँ मन के अनुकूल हों, लोग हमारी इच्छा के अनुसार व्यवहार करें, सम्मान मिले, काम समय पर हो जाएँ और कोई विरोध न करे, तब शांत, सरल और सहज बने रहना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं, वास्तविक व्यक्तित्व की पहचान तब होती है, जब परिस्थिति हमारे विरुद्ध खड़ी हो…!
जिस व्यक्ति की बात के अनुसार काम न हो और फिर भी उसकी भाषा संयमित रहे, जिसकी आलोचना हो और फिर भी वह विवेक न खोए, जिसे अपमान मिले और फिर भी वह अपने संस्कारों की मर्यादा न छोड़े, वास्तविक धैर्यवान वही है…!
क्योंकि धैर्य का अर्थ यह नहीं कि मन में क्रोध पैदा ही न हो, धैर्य का अर्थ है क्रोध पैदा होने के बाद भी निर्णय विवेक से लेना…!
आज सामाजिक जीवन में एक बड़ी समस्या यह है कि हम दूसरों के धैर्य की परीक्षा तो लेते हैं, लेकिन अपने धैर्य का मूल्यांकन नहीं करते, थोड़ी-सी असहमति पर रिश्ते टूट जाते हैं, छोटी-सी आलोचना पर अहंकार जाग जाता है और मन के विरुद्ध कोई बात आते ही वर्षों के संबंध एक क्षण में कठघरे में खड़े कर दिए जाते हैं…!
याद रखिए: अनुकूल परिस्थितियाँ व्यक्ति को सुखी दिखाती हैं, लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियाँ उसके संस्कार दिखाती हैं…!
सच्चा संस्कार वही है जो क्रोध में भाषा को मर्यादित रखे, अधिकार मिलने पर व्यवहार को विनम्र रखे और अपमान मिलने पर भी चरित्र को गिरने न दे…!
इसलिए स्वयं से एक प्रश्न अवश्य पूछिए…?
“मैं कितना शांत हूँ…?” से अधिक महत्वपूर्ण है, “विपरीत परिस्थिति में मैं कितना शांत रह सकता हूँ…?”
क्योंकि जीवन की असली परीक्षा सुख में नहीं, संघर्ष में होती है, व्यक्ति की असली पहचान शब्दों में नहीं, उसके व्यवहार में होती है और उसके धैर्य की असली कीमत अनुकूलता में नहीं, प्रतिकूलता में सामने आती है…!
सामाजिक संदेश:
दूसरों को बदलने से पहले अपने धैर्य का स्तर बढ़ाइए, परिस्थितियाँ हमेशा हमारे अनुसार नहीं चलेंगी, लेकिन परिस्थितियों में हमारा व्यवहार हमारे हाथ में अवश्य है…!
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”






