spot_imgspot_imgspot_imgspot_img

Top 5 This Week

spot_imgspot_imgspot_img

Related Posts

आजादी केवल सीमा की नहीं, सोच की भी होनी चाहिए…!

SAMPADKIY: स्वतंत्रता दिवस विशेष संपादकीय…,

15 अगस्त केवल उस दिन का स्मरण नहीं है, जब भारत ने विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ी थीं, यह दिन हमें हर वर्ष यह सोचने का अवसर भी देता है कि क्या हमारी सोच, हमारी सामाजिक व्यवस्था और हमारी संस्थाएँ भी उतनी ही स्वतंत्र हैं, जितना हमारा राष्ट्र…?

आज आवश्यकता है कि हम आजादी का अर्थ केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और शुभकामनाएँ देने तक सीमित न रखें, सच्ची स्वतंत्रता तब होगी, जब समाज स्वयं अपने भीतर मौजूद उन बेड़ियों को तोड़ेगा, जो मनुष्य की गरिमा, अधिकार और स्वाभिमान को जकड़े हुए हैं…!

समाज को आजादी चाहिए रूढ़िवादिता से…,
ऐसी रूढ़ियों से, जो इंसान को उसकी योग्यता से नहीं, बल्कि परिवार, पद, प्रतिष्ठा, धनबल-बाहुबल और सामाजिक दिखावे से पहचानती हैं, परंपराएँ हमारी विरासत हैं, लेकिन जो परंपरा मानवता और न्याय के विरुद्ध खड़ी हो जाए, उस पर विचार करना भी हमारा सामाजिक दायित्व है…!

समाज को आजादी चाहिए सामाजिक अनियमितताओं से…,
जहाँ नियम सबके लिए समान हों, वहाँ किसी प्रभावशाली व्यक्ति के लिए अलग रास्ता नहीं होना चाहिए, समाज में व्यवस्था तभी मजबूत होगी, जब संबंधों से ऊपर न्याय, पहचान से ऊपर योग्यता और स्वार्थ से ऊपर समाजहित को स्थान मिलेगा…!

समाज को आजादी चाहिए असंवैधानिक प्रक्रियाओं से…,
संविधान केवल किताब में रखा हुआ दस्तावेज नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन का आधार है, किसी भी संस्था, संगठन या सामाजिक व्यवस्था में मनमानी, बंद कमरे के फैसले, नियमों की अनदेखी और अधिकारों का दुरुपयोग स्वतंत्र भारत की भावना के अनुरूप नहीं हो सकता…!

समाज को आजादी चाहिए फर्जी पदों और कागजी प्रतिष्ठा से…,
आज कहीं-कहीं पद सेवा का माध्यम कम और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का साधन अधिक बनते दिखाई देते हैं, पद बड़ा नहीं होता, पद पर बैठकर किया गया काम बड़ा होता है, किसी संस्था की पहचान पदों की लंबी सूची से नहीं, बल्कि उसके कार्यों की पारदर्शिता और समाज के प्रति उसकी उपयोगिता से होती है, नित-प्रतिदिन समाज के भोले-भाले सामाजिक गतिविधियों से अनजान समाज बँधुओं को फर्जी पदों के लॉलीपॉप से…!

समाज को उस मानसिकता से भी आजादी चाहिए, जहाँ सम्मान माँगा जाता है, कमाया नहीं जाता, पद दिखाया जाता है, निभाया नहीं जाता, समाजसेवा बताई जाती है, की नहीं जाती, किसी के भी कार्यक्रम में मंचासीन होकर झूठे महिमा मंडन से, किसी के व्यक्तिगत कार्यक्रम में स्वागत-सम्मान के थोते प्रचार-प्रसार से…!

सामाजिक आजादी का अर्थ यह भी है कि हम चापलूसी से मुक्त हों, भय से मुक्त हों और गलत को गलत कहने का साहस पैदा करें, अपने ही लोगों की गलतियों पर मौन रहना रिश्ते बचाना नहीं, बल्कि गलत व्यवस्था को मजबूत करना है…!

स्वतंत्रता दिवस पर हमें एक संकल्प लेना होगा:

न रूढ़ियों के गुलाम बनेंगे,
न सामाजिक अन्याय के मौन दर्शक बनेंगे,
न असंवैधानिक प्रक्रियाओं को स्वीकार करेंगे,
न फर्जी पद-प्रतिष्ठा के आगे झुकेंगे,
हम सत्य, न्याय, पारदर्शिता, संविधान और सामाजिक सम्मान के साथ खड़े रहेंगे…!

याद रखिए:
देश को आजादी 1947 में मिली थी, लेकिन समाज को वास्तविक आजादी तभी मिलेगी, जब हम अपनी सोच को स्वतंत्र करेंगे…!

आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर केवल देश की आजादी का उत्सव न मनाएँ, बल्कि अपने भीतर के डर, पूर्वाग्रह, दिखावे, रूढ़िवाद और स्वार्थ से भी आजादी का संकल्प लें…!

यही स्वतंत्र भारत की सच्ची तस्वीर होगी, यही लोकतंत्र का सम्मान होगा, यही समाज के प्रति हमारी वास्तविक जिम्मेदारी होगी…!

“आजादी का अर्थ केवल परतंत्रता से मुक्ति नहीं,
बल्कि हर उस सोच से मुक्ति है जो इंसान को इंसान से छोटा बनाती है…!”

सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles