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“स्त्री” के किरदार पर उंगली उठाने से पहले, रिश्तों पर भरोसा कीजिए…,

SAMPADKIY: देश की 80वी स्वतंत्रता दिवस पर भी आज स्त्री के किरदार पर सुनी-सुनाई बातों पर सवाल, क्या यही हैं वास्तविक स्वतंत्रता या आज भी मातृशक्ति के पाँवों में चार लोगों की बेड़ियाँ जकड़ी हुई हैं…?

“मैं नहीं डरती समाज के उन चार लोगों से, मैं डरती हूँ उन अपनों से, जो उन चार लोगों की बातों में आकर मेरे किरदार पर उंगली उठाते हैं…!”

यह केवल एक स्त्री की पीड़ा नहीं, बल्कि उस मानसिकता के विरुद्ध एक आईना है, जो आज भी किसी महिला के चरित्र का फैसला दूसरों की कही-सुनी बातों के आधार पर कर देती है…!

समाज में अक्सर कहा जाता है, “लोग क्या कहेंगे…?”
लेकिन सवाल यह है कि उन लोगों की बातों पर विश्वास करने वाले अपने क्या कहेंगे…?

एक स्त्री के लिए सबसे बड़ा दर्द समाज की आलोचना नहीं होती, सबसे बड़ा दर्द तब होता है, जब उसके अपने ही बिना सच्चाई जाने, बिना उसकी बात सुने, दूसरों की बातों को सच मान लेते हैं…!

स्त्री माँ है, बहन है, बेटी है, पत्नी है, लेकिन इन रिश्तों से पहले वह एक स्वतंत्र व्यक्तित्व और सम्मान की अधिकारी इंसान है, उसके चरित्र का प्रमाण किसी अफवाह, किसी तस्वीर, किसी टिप्पणी या किसी तीसरे व्यक्ति की राय से तय नहीं किया जा सकता…!

दुर्भाग्य यह है कि पुरुष के व्यवहार को “गलती” कहकर भूल जाने वाला समाज, कई बार स्त्री के व्यवहार को “चरित्र” से जोड़ देता है, यह दोहरा मापदंड बदलना होगा…!

किसी स्त्री के चरित्र पर उंगली उठाना आसान है, लेकिन उसके संघर्षों को समझना कठिन…!

उसकी आलोचना करना आसान है, लेकिन उसके साथ खड़ा होना कठिन…!

इसलिए यदि कोई आपके सामने किसी अपने के बारे में कुछ कहे, तो तुरंत निर्णय मत दीजिए, पहले उस व्यक्ति को सुनिए, परिस्थिति को समझिए और फिर सत्य-असत्य का निर्णय कीजिए…!

क्योंकि रिश्ते विश्वास से बनते हैं, अफवाहों से नहीं…!

मातृशक्ति का सम्मान केवल मंच से “नारी शक्ति” कह देने से नहीं होगा, उसका वास्तविक सम्मान तब होगा, जब हम उसकी अनुपस्थिति में भी उसके सम्मान की रक्षा करेंगे और किसी के बहकावे में आकर उसके चरित्र पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाएंगे…!

याद रखिए:

समाज के “चार लोग” आज आपके साथ हैं, कल किसी और के साथ खड़े होंगे, लेकिन अपने रिश्ते जीवनभर आपके साथ रहते हैं, इसलिए चार लोगों की बातों से ज्यादा अपने रिश्तों की सच्चाई पर विश्वास कीजिए…!

स्त्री को कठघरे में खड़ा करने से पहले, एक बार अपने विवेक को कठघरे में खड़ा कीजिए…!

यह लेख सामाजिक जन-जागरण हेतु एक संपादकीय हैं, सामाजिक व्यवस्थाओं के सुधार पर एक सामाजिक चिंतन है…!

सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”

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