SAMPADKIY: आज़ादी सिर्फ देश की नही मिली, अब समय हैं अपने घरों को रिश्तों को भी आजाद, मजबूत और खुशहाल बनाएँ…!
घर से थके हुए इंसान की मंज़िल कहाँ है…?
🌙 सुना था लोग थकने के बाद घर जाते हैं 💔 लेकिन जो घर से ही थक जाएँ, वो कहाँ जाएँ…?
🥀 सुना था लोग हारने के बाद अपनों के पास जाते हैं 😔 लेकिन जो अपनों से हार जाएँ, वो कहाँ जाएँ…?
🏚️ सुना था लोग टूटने के बाद घर जाते हैं 💔 लेकिन जिसका घर ही टूट जाए, वो कहाँ जाएँ…?
सामाजिक जान-जागरण हेतु संपादकीय…,
इंसान की सबसे बड़ी जरूरत केवल रोटी, कपड़ा और मकान नहीं है, उसे एक ऐसी जगह चाहिए जहाँ वह दुनिया की तमाम परेशानियों के बाद अपना सिर रख सके, जहाँ उसके आँसू सवाल न बनें, जहाँ उसकी कमजोरी का मज़ाक न उड़ाया जाए और जहाँ उसे यह भरोसा मिले कि “तुम अकेले नहीं हो…!”
वह जगह घर कहलाती है और वहाँ रहने वाले परिवार के सभी सदस्य अपने कहलाते हैं…!
लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यही है, जब घर ही तनाव का कारण बन जाए, जब अपने ही पराए जैसा व्यवहार करने लगें, जब रिश्तों में विश्वास की जगह स्वार्थ और संवाद की जगह अहंकार आ जाए, तब एक इंसान आखिर जाए तो जाए कहाँ…?
आज हमारे आसपास ऐसे कई लोग हैं जो बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई देते हैं, मुस्कुराते हैं, लोगों से मिलते हैं, सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं, लेकिन भीतर से वे बेहद थके हुए होते हैं, उनकी थकान शरीर की नहीं, मन की होती है…!
किसी को अपनों की उपेक्षा ने तोड़ा है, किसी को विश्वासघात ने, किसी को पारिवारिक कलह ने, किसी को झूठे आरोपों ने और किसी को उस व्यक्ति ने, जिसके सामने उसने अपना पूरा विश्वास रख दिया था…!
सबसे दु:खद स्थिति तब होती है जब इंसान अपनी पीड़ा लेकर उन्हीं लोगों के पास जाता है, जिनसे उसे सहारे की उम्मीद होती है, और वहीं उसे ताने, उपेक्षा अथवा अपमान मिल जाता है…!
याद रखिए, हर व्यक्ति जो चुप है, जरूरी नहीं कि वह खुश हो, हर मुस्कुराता चेहरा बेफिक्र हो, यह भी जरूरी नहीं…!
कभी-कभी किसी व्यक्ति को समाधान नहीं, सिर्फ एक ऐसा कान चाहिए होता है जो उसे बिना टोके सुन सके, उसे सलाह नहीं, कुछ पल का अपनापन चाहिए होता है, उसे यह एहसास चाहिए होता है कि उसकी भावनाओं की भी कोई कीमत है…!
रिश्ते घर से बनते हैं, मकान से नहीं, चार दीवारें मकान बनाती हैं, लेकिन विश्वास, सम्मान, संवेदना और अपनापन घर बनाते हैं…!
इसलिए परिवार में यह जरूरी है कि हम एक-दूसरे की बात सुनें, छोटी-छोटी बातों को अहंकार का प्रश्न न बनाएँ, गलती होने पर सुधार का अवसर दें, रिश्तों में जीतने के बजाय रिश्तों को बचाने की कोशिश करें…!
क्योंकि अदालत में मुकदमा जीतने वाला व्यक्ति भी अपने रिश्ते हार सकता है, और बहस में जीतने वाला व्यक्ति जीवन में किसी अपने को खो सकता है…!
रिश्तों में हर बार यह साबित करना जरूरी नहीं कि कौन सही है, कभी-कभी यह जरूरी होता है कि रिश्ता सही सलामत रहे…!
आज समाज को बड़ी-बड़ी इमारतों से ज्यादा बड़े दिलों की जरूरत है, ऐसे परिवारों की जरूरत है जहाँ बुजुर्गों को बोझ न समझा जाए, बच्चों को केवल अंक और उपलब्धियों से न आँका जाए, जीवनसाथी को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि साथी समझा जाए और भाई-बहन के रिश्तों में संपत्ति से ज्यादा अपनापन हो…!
किसी के जीवन में ऐसा व्यक्ति बनिए जिसके पास वह अपनी हार लेकर आ सके…!
किसी के लिए वह घर बनिए जहाँ वह दुनिया से हारकर भी अपनों के बीच जीतने का एहसास कर सके…!
क्योंकि जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि इंसान कभी हार जाए, सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हारने के बाद उसे अपना कहने वाला कोई न मिले…!
आइए, अपने घर को फिर से घर बनाएँ…!
आज से तय करें:
किसी अपने की चुप्पी को नजरअंदाज नहीं करेंगे, किसी की परेशानी को मजाक नहीं बनाएँगे, गुस्से में रिश्ते तोड़ने से पहले एक बार संवाद जरूर करेंगे और अपने परिवार में ऐसी जगह जरूर बनाएँगे जहाँ कोई भी व्यक्ति अपनी कमजोरी छिपाने के लिए मजबूर न हो…!
क्योंकि घर वह नहीं जहाँ हम सिर्फ रहते हैं, घर वह है जहाँ हम टूटकर भी सुरक्षित महसूस करते हैं…!
और यदि आपके आसपास कोई व्यक्ति भीतर से थका हुआ दिखाई दे, तो उसके पास बैठिए, उसकी बात सुनिए और उसे यह महसूस कराइए, “तुम्हें अकेले नहीं लड़ना है, तुम्हारे अपने अभी भी तुम्हारे साथ हैं…!”
यही संवेदना परिवार बचाएगी, यही अपनापन रिश्ते बचाएगा और यही जागरूकता समाज को मजबूत बनाएगी…!
“रिश्तों को जीतने से पहले, रिश्तों को बचाना सीखिए…!”
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”






