SAMPADKIY/संपादकीय : प्रेम की चूनर, वैराग्य का मन…
“तन ओढ़े चूनर प्रेम की,
मन वैरागी भस्म रमाये…!” ❣️🌼
आज के समय में प्रेम शब्द जितना बोला जाता है, उतना शायद समझा नहीं जाता, प्रेम को हमने आकर्षण, अपेक्षा, अधिकार और स्वार्थ की सीमाओं में बाँध दिया है, जबकि सच्चा प्रेम वह है, जहाँ पाना ही उद्देश्य नहीं होता, बल्कि निभाना भी आता है, अधिकार से पहले सम्मान और अपेक्षा से पहले समर्पण होता है…!
प्रेम की चूनर ओढ़ना आसान है, लेकिन मन में वैराग्य धारण करना कठिन, इसका अर्थ प्रेम से दूर होना नहीं, बल्कि प्रेम में रहते हुए भी मोह, अहंकार और स्वार्थ से दूर रहना है…!
आज रिश्तों में सबसे बड़ी समस्या प्रेम की कमी नहीं, बल्कि अपेक्षाओं की अधिकता है, हम चाहते हैं कि सामने वाला हमें समझे, हमारी भावनाओं का सम्मान करे, हमारी हर बात माने, लेकिन स्वयं उसके मन को समझने का प्रयास कितने लोग करते हैं…?
सच्चा वैराग्य रिश्ते छोड़ना नहीं सिखाता, बल्कि रिश्तों में छिपे स्वार्थ को छोड़ना सिखाता है, वह कहता है, प्रेम करो, मगर किसी को अपना गुलाम मत समझो, सम्मान दो, मगर बदले में सम्मान की बोली मत लगाओ, रिश्ता निभाओ, मगर अपने स्वाभिमान की कीमत पर नहीं…!
समाज में आज दिखावे का प्रेम बढ़ रहा है, तस्वीरों में मुस्कुराते चेहरे और भीतर टूटते रिश्ते इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं, सोशल मीडिया ने रिश्तों को सार्वजनिक कर दिया, लेकिन मन की दूरी को कम नहीं किया, कई बार हम दुनिया को अपने रिश्ते की खूबसूरती दिखाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उसी रिश्ते को भीतर से सींचना भूल जाते हैं…!
प्रेम का वास्तविक सौंदर्य प्रदर्शन में नहीं, व्यवहार में है, जहाँ प्रेम है, वहाँ क्षमा होगी, जहाँ सम्मान है, वहाँ स्वतंत्रता होगी, जहाँ विश्वास है, वहाँ अनावश्यक शक नहीं होगा, और जहाँ वैराग्य है, वहाँ संबंधों में स्वार्थ का बोझ नहीं होगा…!
आज समाज को ऐसे प्रेम की आवश्यकता है, जो युवा पीढ़ी को केवल आकर्षण नहीं, जिम्मेदारी सिखाए, विवाह को केवल सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों के सम्मान और सहयोग का संबंध समझाए और परिवार को केवल साथ रहने की जगह नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुःख में खड़े रहने का संस्कार बनाए…!
तन पर प्रेम की चूनर हो और मन में वैराग्य की भस्म यही संतुलन जीवन को सुंदर बनाता है…!
क्योंकि “प्रेम” वह नहीं जो हमें किसी का मालिक बना दे, प्रेम वह है जो हमें बेहतर इंसान बना दे, और “वैराग्य” वह नहीं जो संसार से भागना सिखाए,
वैराग्य वह है जो संसार में रहते हुए भी मन को लोभ, अहंकार, ईर्ष्या और स्वार्थ से मुक्त रखे…!
आज आवश्यकता है कि हम प्रेम को फिर से उसकी गरिमा लौटाएँ और वैराग्य को पलायन नहीं, आत्मिक परिपक्वता के रूप में समझें…!
प्रेम की चूनर तन पर रहे, वैराग्य की भस्म मन पर रहे, तभी रिश्ते भी बचेंगे और इंसानियत भी…!🌼🙏
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”






