नागपंचमी विशेष संपादकीय:
समाज का दूध पीने वाले “नाग” सच की आवाज़ से क्यों डरते हैं और अनैतिक व्यवहार से अपने ही समाज को डसते हैं…?
“नागपंचमी केवल नागों की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर और समाज के भीतर छिपे विष को पहचानने का अवसर भी है…!”
नागपंचमी के पावन अवसर पर आज जब हम नाग देवता को दूध अर्पित कर उनकी पूजा करते हैं, तब एक सामाजिक प्रश्न भी हमारे सामने खड़ा होना चाहिए…?
क्या समाज में ऐसे “नाग” भी हैं, जो समाज का ही दूध पीकर उसी समाज में विष घोलने का काम कर रहे हैं…?
यहाँ “नाग” किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि उस ओछी मानसिकता का प्रतीक है जो समाज के संसाधनों, सम्मान, सहयोग और विश्वास का लाभ उठाकर समाज के विरुद्ध अनैतिक, असंवैधानिक और अमानवीय गतिविधियों को बढ़ावा देती है…!
कुछ लोग समाज की एकता, प्रतिष्ठा और विश्वास को अपनी निजी महत्वाकांक्षाओं की सीढ़ी बना लेते हैं, कभी झूठी अफवाहें उड़ाई जाती हैं, कभी आधी-अधूरी जानकारी को तथ्य बनाकर प्रस्तुत किया जाता है और कभी किसी व्यक्ति की छवि खराब करने के लिए पीठ पीछे ऐसी बातें फैलाई जाती हैं, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध ही नहीं होता…!
लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि जब उनसे कहा जाता है “अफवाह नहीं, तथ्य प्रस्तुत कीजिए” तो अचानक मौन छा जाता है…!
जब प्रमाण माँगा जाता है, तो जवाब गायब हो जाता है, जब दस्तावेज माँगे जाते हैं, तो विषय बदल दिया जाता है, जब सत्य सामने रखने की बात होती है, तो कई लोगों को मानो “साँप सूंघ जाता है…!”
समाज सेवा और समाज का शोषण दोनों अलग बातें हैं…,
समाज की सेवा करने का अर्थ समाज पर अधिकार जमाना नहीं है, पद मिल जाना नेतृत्व की गारंटी नहीं है, सम्मान मिल जाना किसी को कानून से ऊपर नहीं कर देता, और धनबल-बाहुबल या मक्कारी से समाज का सहयोग प्राप्त कर लेना किसी को समाज के साथ मनमानी करने का अधिकार नहीं देता…!
लोकतांत्रिक और सामाजिक व्यवस्था में प्रश्न पूछना अपराध नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है, पारदर्शिता माँगना विरोध नहीं है, तथ्य माँगना अपमान नहीं है और गलत को गलत कहना किसी व्यक्ति के विरुद्ध अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता के पक्ष में खड़ा होना है…!
अफवाह का विष समाज को भीतर से खोखला करता है…,
झूठी अफवाह किसी साँप के विष से कम खतरनाक नहीं होती, एक झूठी बात किसी व्यक्ति की वर्षों की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचा सकती है, परिवारों में तनाव पैदा कर सकती है और समाज में अविश्वास की दीवार खड़ी कर सकती है…!
इसलिए नागपंचमी पर हमें केवल नाग देवता को दूध चढ़ाने की परंपरा नहीं निभानी चाहिए, बल्कि अपने शब्दों में घुल चुके विष को भी पहचानना चाहिए…!
क्या हम बिना सत्यापन किसी की बात आगे बढ़ाते हैं…?
क्या हम सुनी-सुनाई बात को सत्य मान लेते हैं…?
क्या हम किसी व्यक्ति की अनुपस्थिति में उसके विरुद्ध बातें करते हैं…?
क्या हम तथ्य सामने आने के बाद भी अफवाहों को बचाने का प्रयास करते हैं…?
यदि उत्तर “हाँ” है, तो समस्या केवल समाज में नहीं हमारे भीतर भी है…!
सत्य से डरने वालों को सत्य से नहीं, अपने कर्मों से डरना चाहिए…,
सच्चाई की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसे बार-बार प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं होती, समय स्वयं उसका प्रमाण बन जाता है, जो लोग झूठ, अफवाह और षड्यंत्र के सहारे सामाजिक प्रतिष्ठा बनाना चाहते हैं, उन्हें समझना होगा कि समाज अब पहले जैसा भोला नहीं है, आज लोग सवाल पूछते हैं, प्रमाण देखते हैं और तथ्य समझना चाहते हैं…!
इसलिए किसी भी व्यक्ति या संस्था के संबंध में कोई आरोप हो तो उसे अफवाह बनाकर नहीं, प्रमाण के साथ उचित मंच पर रखा जाना चाहिए…!
नागपंचमी का संकल्प…,
आइए इस नागपंचमी पर संकल्प लें:
न झूठी अफवाह फैलाएँगे, न बिना प्रमाण किसी की निंदा करेंगे, न समाज के नाम पर अनैतिकता को संरक्षण देंगे, न असंवैधानिक गतिविधियों को स्वीकार करेंगे, और न ही सत्य बोलने वालों को डराने या दबाने की संस्कृति को बढ़ावा देंगे…!
समाज को दूध पीने वाले “नागों” से नहीं, समाज में विष घोलने वाली मानसिकता से सावधान रहने की आवश्यकता है…!
क्योंकि असली नागपंचमी तभी सार्थक होगी, जब हम नाग देवता की पूजा के साथ-साथ अपने समाज से झूठ, द्वेष, अफवाह, छल और अन्याय का विष भी निकालने का प्रयास करें…!
सत्य बोलिए,
प्रमाण के साथ बोलिए,
मर्यादा के साथ बोलिए,
लेकिन इतना अवश्य बोलिए कि समाज में झूठ की आवाज़, सत्य की आवाज़ से बड़ी न हो जाए…!
संपादकीय:
सुरेश कुमार व्यास “जानम”
सिखवाल समाचार®
सत्य का “दर्पण”-समाज को “अर्पण”






