राजस्थान की धरती केवल रेत के धोरों और भव्य किलों के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहाँ की संस्कृति, परंपराएँ और संस्कार भी पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखते हैं…!
“मरु माणस” अर्थात रेगिस्तान का वह इंसान जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान, संस्कार और रिश्तों को जीवित रखता है…!
राजस्थानी संस्कृति हमें सिखाती है कि परिवार केवल खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कारों और सम्मान से जुड़ा रहता है, जब परिवारों में अपनापन, समाज में बड़ों का आदर, महिलाओं का सम्मान और समाज के प्रति जिम्मेदारी बनी रहती है, तब समाज मजबूत होता है…!
आज आधुनिकता की दौड़ में लोग अपनी परंपराओं और संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं, लेकिन जिस समाज ने अपनी संस्कृति को बचाकर रखा, वही समाज आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना, जिस समाज में फर्जीवाडे अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच चुके हो, जिस समाज में असंवैधानिक, अनैतिकता पूर्ण व्यवहार करने वाले स्वयम्भू उच्च पदों पर विराजमान पदाधिकारी तथा चाटुकारों चमचों की भरमार हो, ऐसा समाज टूटने लगता हैं, धीरे-धीरे ऐसा समाज संस्कारविहीन हो जाता हैं, तथा अन्य समाजों में ऐसे समाज की छवि क्षीण हो जाती हैं, गरिमामय समाज को हीन भावना से देखा जाता हैं…!
राजस्थानी लोक संस्कृति में “पधारो म्हारे देश” जैसी आत्मीयता, त्याग, वीरता और सम्मान की भावना सदियों से जीवित है…!
मरु माणस की पहचान उसकी वेशभूषा, बोली और रहन-सहन से ही नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और संस्कारों से होती है, जब संस्कार जीवित रहते हैं, तब परिवार मजबूत बनते हैं, और जब परिवार मजबूत होते हैं, तब समाज का मान और पहचान भी अमर रहती है…!
इसलिए आवश्यक है कि हम अपनी संस्कृति, भाषा, लोक परंपराओं और पारिवारिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ…!
यही हमारी असली धरोहर और समाज की सबसे बड़ी ताकत है…!
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